अरण्यकाण्ड

अध्याय 42: नारद का वर: राम नाम सब नामों से बड़ा

6 श्लोक · 42 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

नारद का वर: राम नाम सब नामों से बड़ा

नारद कहते हैं: हे परम उदार रघुनायक; स्वामी, एक वर माँगता हूँ, यद्यपि आप अन्तर्यामी सब जानते हैं। राम कहते हैं: मुनि, तुम मेरा स्वभाव जानते हो, क्या मैं अपने जन से कभी कुछ छिपाता हूँ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय है जिसे तुम माँग न सको? जन के लिए मेरे पास कुछ अदेय नहीं। तब नारद हर्षित होकर ढिठाई से वर माँगते हैं: यद्यपि प्रभु के अनेक नाम हैं और श्रुति कहती है कि एक से एक बढ़कर हैं, फिर भी राम नाम सब नामों से अधिक हो। आपकी भक्ति पूर्णिमा की रात हो, उसमें राम नाम चन्द्रमा हो, और दूसरे नाम निर्मल तारे, जो भक्तों के हृदय-आकाश में बसें। कृपासिन्धु रघुनाथ ने 'एवमस्तु' कहा, और अत्यन्त हर्षित नारद ने प्रभु के चरणों में माथा नवाया।

42.1

सुनहु उदार परम रघुनायक । सुन्दर अगम सुगम बर-दायक ॥
देहु एक बर माँगउँ स्वामी । जद्यपि जानत अन्तरजामी ॥

sunahu udāra parama raghunāyaka | sundara agama sugama bara-dāyaka ||
dehu eka bara mām̐gaum̐ svāmī | jadyapi jānata antarajāmī ||

42.2

जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ । जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ ॥
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी । जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी ॥

jānahu muni tumha mora subhāū | jana sana kabahum̐ ki karaum̐ durāū ||
kavana bastu asi priya mohi lāgī | jo munibara na sakahu tumha māgī ||

42.3

जन कहँ कछु अदेय नहिं मोरें । अस बिस्वास तजहु जनि भोरें ॥
तब नारद बोले हरषाई । अस बर माँगउँ करउँ ढिठाई ॥

jana kaham̐ kachu adeya nahiṃ moreṃ | asa bisvāsa tajahu jani bhoreṃ ||
taba nārada bole haraṣāī | asa bara mām̐gaum̐ karaum̐ ḍhiṭhāī ||

42.4

जद्यपि प्रभु के नाम अनेका । श्रुति कह अधिक एक तेँ एका ॥
राम सकल नामन्ह ते अधिका । होउ नाथ अघ-खग-गन-बधिका ॥

jadyapi prabhu ke nāma anekā | śruti kaha adhika eka tem̐ ekā ||
rāma sakala nāmanha te adhikā | hou nātha agha-khaga-gana-badhikā ||

दो॰ 42 (क)दोहा

राका रजनी भगति तव, राम नाम लाइ सोम ।
अपर नाम उडुगन बिमल, बसहु भगत-उर-ब्योम ॥

rākā rajanī bhagati tava, rāma nāma lāi soma |
apara nāma uḍugana bimala, basahu bhagata-ura-byoma ||

दो॰ 42 (ख)दोहा

एवमस्तु मुनि सन कहेउ, कृपासिन्धु रघुनाथ ।
तब नारद मन हरष अति, प्रभु-पद नायउ माथ ॥

evamastu muni sana kaheu, kṛpāsindhu raghunātha |
taba nārada mana haraṣa ati, prabhu-pada nāyau mātha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0