अरण्यकाण्ड

अध्याय 43: नारद का विवाह प्रभु ने क्यों रोका

6 श्लोक · 43 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

नारद का विवाह प्रभु ने क्यों रोका

रघुनाथ को अत्यन्त प्रसन्न जानकर नारद फिर कोमल वाणी से बोले: हे राम, जब आपने अपनी माया प्रेरित करके मुझे मोहित किया, तब मैं विवाह करना चाहता था; प्रभु ने किस कारण नहीं करने दिया? प्रभु प्रेम से बोले: मुनि, सुनो, जो सब भरोसा छोड़कर मुझे भजते हैं, मैं उनकी सदा ऐसे रखवाली करता हूँ जैसे माता बालक की। छोटा बच्चा आग या साँप पकड़ने दौड़े, तो माता उसे बचा लेती है। ज्ञानी मेरे बड़े पुत्र के समान है, मानरहित दास छोटे बालक के समान। सेवक को मेरा बल है, ज्ञानी को अपना। यह विचारकर पण्डित मुझे भजते हैं और ज्ञान पाकर भी भक्ति नहीं छोड़ते। काम, क्रोध, लोभ आदि प्रबल मोह की सेना हैं, और राम कहते हैं कि उनमें सबसे दारुण और दुखदायी माया-रूपी नारी है।

43.1

अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी । पुनि नारद बोले मृदु बानी ॥
राम जबहिँ प्रेरेउ निज माया । मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया ॥

ati prasanna raghunāthahi jānī | puni nārada bole mṛdu bānī ||
rāma jabahim̐ prereu nija māyā | mohehu mohi sunahu raghurāyā ||

43.2

तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा । प्रभु केहि कारन करइ न दीन्हा ॥
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा । भजहिँ जे मोहि तजि सकल भरोसा ॥

taba bibāha maiṃ cāhaum̐ kīnhā | prabhu kehi kārana karai na dīnhā ||
sunu muni tohi kahaum̐ saharosā | bhajahim̐ je mohi taji sakala bharosā ||

43.3

करउँ सदा तिन्ह के रखवारी । जिमि बालक राखइ महतारी ॥
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई । तहँ राखइ जननी अरु गाई ॥

karaum̐ sadā tinha ke rakhavārī | jimi bālaka rākhai mahatārī ||
gaha sisu baccha anala ahi dhāī | taham̐ rākhai jananī aru gāī ||

43.4

प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता । प्रीति करइ नहिं पाछिल बाता ॥
मोरे प्रौढ़-तनय-सम ज्ञानी । बालक-सुत सम दास अमानी ॥

praur̤ha bhaem̐ tehi suta para mātā | prīti karai nahiṃ pāchila bātā ||
more praur̤ha-tanaya-sama jñānī | bālaka-suta sama dāsa amānī ||

43.5

जनहिँ मोर बल निज-बल ताही । दुहुँ कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं । पाएहुँ ज्ञान भगति नहिं तजहीं ॥

janahim̐ mora bala nija-bala tāhī | duhum̐ kaham̐ kāma krodha ripu āhī ||
yaha bicāri paṃḍita mohi bhajahīṃ | pāehum̐ jñāna bhagati nahiṃ tajahīṃ ||

दो॰ 43दोहा

काम क्रोध लोभादि पद, प्रबल मोह के धारि ।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद, माया रूपी नारि ॥

kāma krodha lobhādi pada, prabala moha ke dhāri |
tinha maham̐ ati dāruna dukhada, māyā rūpī nāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0