अरण्यकाण्ड

अध्याय 41: विरही श्रीराम के पास नारद का आना

7 श्लोक · 41 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

विरही श्रीराम के पास नारद का आना

अत्यन्त सुन्दर तालाब देखकर राम ने स्नान किया और परम सुख पाया, फिर एक सुन्दर वृक्ष की छाया में अनुज सहित बैठ गए। देवता और मुनि स्तुति करने आए। भगवान को विरह में देखकर नारद के मन में बड़ा सोच हुआ: मेरा ही शाप स्वीकार करके राम इतने दुख सह रहे हैं। ऐसे प्रभु के दर्शन करने चलूँ, ऐसा अवसर फिर नहीं आएगा। यह सोचकर हाथ में वीणा लिए नारद वहाँ गए जहाँ प्रभु सुख से बैठे थे, कोमल वाणी से प्रेमपूर्वक राम-चरित गाते हुए। दण्डवत् करते ही प्रभु ने उन्हें उठाकर बार-बार हृदय से लगाया और लक्ष्मण ने आदर से उनके चरण धोए। अनेक प्रकार से विनती करके, प्रभु को प्रसन्न जानकर नारद कमल-से हाथ जोड़कर बोले।

41.1

देखि राम अति रुचिर तलावा । मज्जन कीन्ह परम सुख पावा ॥
देखी सुन्दर तरुबर छाया । बैठे अनुज सहित रघुराया ॥

dekhi rāma ati rucira talāvā | majjana kīnha parama sukha pāvā ||
dekhī sundara tarubara chāyā | baiṭhe anuja sahita raghurāyā ||

41.2

तहँ पुनि सकल देव मुनि आये । अस्तुति करि निज धाम सिधाये ॥
बैठे परम प्रसन्न कृपाला । कहत अनुज सन कथा रसाला ॥

taham̐ puni sakala deva muni āye | astuti kari nija dhāma sidhāye ||
baiṭhe parama prasanna kṛpālā | kahata anuja sana kathā rasālā ||

41.3

बिरहवन्त भगवंतहि देखी । नारद मन भा सोच बिसेखी ॥
भार साप करि अङ्गीकारा । सहत राम नाना दुख भारा ॥

birahavanta bhagavaṃtahi dekhī | nārada mana bhā soca bisekhī ||
bhāra sāpa kari aṅgīkārā | sahata rāma nānā dukha bhārā ||

41.4

ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई । पुनि न बनिहि अस अवसर आई ॥
यह बिचारि नारद कर बीना । गये जहाँ प्रभु सुख आसीना ॥

aise prabhuhi bilokaum̐ jāī | puni na banihi asa avasara āī ||
yaha bicāri nārada kara bīnā | gaye jahām̐ prabhu sukha āsīnā ||

41.5

गावत राम चरित मृदु बानी । प्रेम सहित बहु भाँति बखानी ॥
करत दंडवत लिये उठाई । राखे बहुत बार उर लाई ॥

gāvata rāma carita mṛdu bānī | prema sahita bahu bhām̐ti bakhānī ||
karata daṃḍavata liye uṭhāī | rākhe bahuta bāra ura lāī ||

41.6

स्वागत पूँछि निकट बैठारे । लछिमन सादर चरन पखारे ॥

svāgata pūm̐chi nikaṭa baiṭhāre | lachimana sādara carana pakhāre ||

दो॰ 41दोहा

नाना बिधि बिनती करि, प्रभु प्रसन्न जियँ जानि ।
नारद बोले बचन तब, जोरि सरोरुह-पानि ॥

nānā bidhi binatī kari, prabhu prasanna jiyam̐ jāni |
nārada bole bacana taba, jori saroruha-pāni ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0