इस अध्याय में क्या होता है अत्रि की स्तुति: नमामि भक्त वत्सलं अत्रि की स्तुति छह संस्कृत छन्दों में है, जिसे घर-घर में उसके आरम्भ 'नमामि भक्त वत्सलं' से जाना जाता है। वे भक्तों पर स्नेह करने वाले, कृपालु और कोमल स्वभाव वाले प्रभु को नमन करते हैं, जिनके चरणकमल निष्काम जनों को अपना धाम देते हैं। वे श्यामसुन्दर, लम्बी भुजाओं वाले, तरकस-धनुष-बाणधारी, सूर्यवंश के भूषण, शिव-धनुष तोड़ने वाले, असुर-समूह के संहारक, ब्रह्मा आदि देवों से सेवित, लक्ष्मीपति और शुद्ध बोधस्वरूप राम का गान करते हैं। जो ईर्ष्या त्यागकर उनके चरण भजते हैं, वे संशय की लहरों से भरे भवसागर में नहीं गिरते। वे एक, अद्भुत, शाश्वत जगद्गुरु, तुरीय, कुयोगियों को दुर्लभ और भक्तों के कल्पवृक्ष हैं। अन्त में अत्रि सिर नवाकर यही माँगते हैं कि उनकी बुद्धि कभी प्रभु के चरण न छोड़े।
4.छं॰ 1 छन्द नमामि भक्त वत्सलं । कृपालु-शील-कोमलं । भजामि ते पदाम्बुजं । अकामिनां स्वधामदं ॥ निकाम-श्याम-सुन्दरं । भवाम्बुनाथ-मन्दरं । प्रफुल्ल-कञ्ज-लोचनं । मदादि-दोष-मोचनं ॥
namāmi bhakta vatsalaṃ | kṛpālu-śīla-komalaṃ | bhajāmi te padāmbujaṃ | akāmināṃ svadhāmadaṃ || nikāma-śyāma-sundaraṃ | bhavāmbunātha-mandaraṃ | praphulla-kañja-locanaṃ | madādi-doṣa-mocanaṃ ||
4.छं॰ 2 छन्द प्रलम्ब-बाहु-विक्रमं । प्रभोऽप्रमेय वैभवं । निषङ्ग-चाप-सायकं । धरं त्रिलोक-नायकं ॥ दिनेश-वंश-मंडनं । महेश-चाप-खण्डनं । मुनीन्द्र-सन्त-रंजनं । सुरारि-वृन्द-भंजनं ॥
pralamba-bāhu-vikramaṃ | prabho'prameya vaibhavaṃ | niṣaṅga-cāpa-sāyakaṃ | dharaṃ triloka-nāyakaṃ || dineśa-vaṃśa-maṃḍanaṃ | maheśa-cāpa-khaṇḍanaṃ | munīndra-santa-raṃjanaṃ | surāri-vṛnda-bhaṃjanaṃ ||
4.छं॰ 3 छन्द मनोज वैरि वन्दितं । अजादि-देव-सेवितं । विशुद्ध बोध विग्रहं । समस्त-दूषणापहं ॥ नमामि इन्दिरा पतिं । सुखाकरं सतां गतिं । भजे सशक्ति सानुजं । शची-पतिं-प्रियानुजं ॥
manoja vairi vanditaṃ | ajādi-deva-sevitaṃ | viśuddha bodha vigrahaṃ | samasta-dūṣaṇāpahaṃ || namāmi indirā patiṃ | sukhākaraṃ satāṃ gatiṃ | bhaje saśakti sānujaṃ | śacī-patiṃ-priyānujaṃ ||
4.छं॰ 4 छन्द त्वदंघ्रि मूल ये नराः । भजन्ति हीन-मत्सरा । पतन्ति नो भवार्णवे । वितर्क-वीचि संकुले ॥ विविक्त वासिनः सदा । भजंति मुक्तये मुदा । निरस्य इन्द्रियादिकं । प्रयान्ति ते गतिं-स्वकं ॥
tvadaṃghri mūla ye narāḥ | bhajanti hīna-matsarā | patanti no bhavārṇave | vitarka-vīci saṃkule || vivikta vāsinaḥ sadā | bhajaṃti muktaye mudā | nirasya indriyādikaṃ | prayānti te gatiṃ-svakaṃ ||
4.छं॰ 5 छन्द तमेकमभ्दुतं प्रभुं । निरीहमीश्वरं विभुं । जगद्गुरुं च शाश्वतं । तुरीयमेव केवलं ॥ भजामि भाव वल्लभं । कुयोगिनां सुदुर्लभं । स्वभक्त कल्प पादपं । समं सुसेव्यमन्वहं ॥
tamekamabhdutaṃ prabhuṃ | nirīhamīśvaraṃ vibhuṃ | jagadguruṃ ca śāśvataṃ | turīyameva kevalaṃ || bhajāmi bhāva vallabhaṃ | kuyogināṃ sudurlabhaṃ | svabhakta kalpa pādapaṃ | samaṃ susevyamanvahaṃ ||
4.छं॰ 6 छन्द अनूप रूप भूपतिं । नतोऽहमुर्विजा पतिं । प्रसीद मे नमामि ते । पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥ पठन्ति ये स्तवं इदं । नरादरेण ते पदं । ब्रजन्ति नात्र संशयं । त्वदीय भक्ति संयुता ॥
anūpa rūpa bhūpatiṃ | nato'hamurvijā patiṃ | prasīda me namāmi te | padābja bhakti dehi me || paṭhanti ye stavaṃ idaṃ | narādareṇa te padaṃ | brajanti nātra saṃśayaṃ | tvadīya bhakti saṃyutā ||
दो॰ 4 दोहा बिनती करि मुनि नाइ सिर, कह कर जोरि बहोरि । चरन सरोरुह नाथ जनि, कबहुँ तजइ मति मोरि ॥
binatī kari muni nāi sira, kaha kara jori bahori | carana saroruha nātha jani, kabahum̐ tajai mati mori ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
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