अरण्यकाण्ड

अध्याय 35: श्रीराम शबरी से कहते हैं, भक्ति ही नाता है

5 श्लोक · 35 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम शबरी से कहते हैं, भक्ति ही नाता है

शबरी हाथ जोड़कर सामने खड़ी हुई; प्रभु को देखकर उसकी प्रीति और बढ़ी। वह बोली: आपकी स्तुति कैसे करूँ? मैं अधम जाति की और अत्यन्त जड़-बुद्धि हूँ; स्त्रियाँ अधम से भी अधम हैं, और उनमें भी मैं मन्दबुद्धि हूँ। रघुपति बोले: हे भामिनी, सुनो, मैं केवल एक भक्ति का ही नाता मानता हूँ। जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, परिवार, गुण और चतुराई, इन सबके रहते भी भक्ति-हीन मनुष्य ऐसा लगता है जैसे जल-रहित बादल। अब मैं तुम्हें नवधा भक्ति कहता हूँ, सावधान होकर सुनो और मन में धरो। पहली भक्ति सन्तों का संग है। दूसरी मेरी कथा के प्रसंगों में प्रेम। तीसरी अभिमान छोड़कर गुरु के चरणकमलों की सेवा। चौथी कपट छोड़कर मेरे गुणों का गान।

35.1

पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी । प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी ॥
केहि बिधि अस्तुति करउँ तुम्हारी । अधम जाति मैं जड़मति भारी ॥

pāni jori āgeṃ bhai ṭhār̤hī | prabhuhi biloki prīti ati bār̤hī ||
kehi bidhi astuti karaum̐ tumhārī | adhama jāti maiṃ jar̤amati bhārī ||

35.2

अधम तें अधम अधम अति नारी । तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारी ॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता । मानउँ एक भगति कर नाता ॥

adhama teṃ adhama adhama ati nārī | tinha maham̐ maiṃ matimanda aghārī ||
kaha raghupati sunu bhāmini bātā | mānaum̐ eka bhagati kara nātā ||

35.3

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई ॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिय जैसा ॥

jāti pām̐ti kula dharma bar̤āī | dhana bala parijana guna caturāī ||
bhagati hīna nara sohai kaisā | binu jala bārida dekhiya jaisā ||

35.4

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीँ । सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥
प्रथम भगति सन्तन्ह कर सङ्गा । दूसरि रति मम कथा प्रसङ्गा ॥

navadhā bhagati kahaum̐ tohi pāhīm̐ | sāvadhāna sunu dharu mana māhīṃ ||
prathama bhagati santanha kara saṅgā | dūsari rati mama kathā prasaṅgā ||

दो॰ 35दोहा

गुरु-पद-पङ्कज सेवा, तीसरि भगति अमान ।
चौथि भगति सम-गुन-गन, करइ कपट तजि गान ॥

guru-pada-paṅkaja sevā, tīsari bhagati amāna |
cauthi bhagati sama-guna-gana, karai kapaṭa taji gāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0