इस अध्याय में क्या होता है नवधा भक्ति और शबरी की परम गति राम नवधा भक्ति पूरी करते हैं। पाँचवीं, वेद में प्रसिद्ध, दृढ़ विश्वास से मेरे मन्त्र का जप। छठी, इन्द्रिय-संयम, शील और सज्जनों का धर्म। सातवीं, जगत को मुझसे भरा देखना और सन्तों को मुझसे भी बड़ा मानना। आठवीं, जो मिले उसमें सन्तोष और स्वप्न में भी पराए दोष न देखना। नौवीं, सबसे सरल और छलहीन व्यवहार, हृदय में मेरा भरोसा, न हर्ष न दीनता। नौ में से एक भी जिसमें हो वह मुझे अत्यन्त प्रिय है; तुममें सब दृढ़ हैं। योगियों को दुर्लभ गति आज तुम्हें सुलभ है। शबरी कहती है: पम्पा सरोवर जाइए, वहाँ सुग्रीव से मित्रता होगी। फिर हरि का मुख देखती, चरणों को हृदय में धरे, वह योगाग्नि में देह छोड़कर हरि-चरणों में लीन हो गई, जहाँ से कोई लौटता नहीं।
36.1 मन्त्र-जाप सम दृढ़ बिस्वासा । पञ्चम भजन सो बेद प्रकासा ॥ छठ दम-सील बिरति बहु करमा । निरत निरन्तर सज्जन-धरमा ॥
mantra-jāpa sama dṛr̤ha bisvāsā | pañcama bhajana so beda prakāsā || chaṭha dama-sīla birati bahu karamā | nirata nirantara sajjana-dharamā ||
36.2 सातवँ सम मोहि मय जग देखा । मा तें सन्त अधिक करि लेखा ॥ आठवँ जथालाभ सन्तोषा । सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ॥
sātavam̐ sama mohi maya jaga dekhā | mā teṃ santa adhika kari lekhā || āṭhavam̐ jathālābha santoṣā | sapanehum̐ nahiṃ dekhai paradoṣā ||
36.3 नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥ नव महँ एकउ जिन्ह के होई । नारि पुरुष सचराचर कोई ॥
navama sarala saba sana chalahīnā | mama bharosa hiyam̐ haraṣa na dīnā || nava maham̐ ekau jinha ke hoī | nāri puruṣa sacarācara koī ||
36.4 सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे । सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ॥ जोगि-बृन्द दुर्लभ-गति जोई । तो कह आजु सुलभ भइ सोई ॥
soi atisaya priya bhāmini more | sakala prakāra bhagati dṛr̤ha toreṃ || jogi-bṛnda durlabha-gati joī | to kaha āju sulabha bhai soī ||
36.5 मल दरसन फल परम अनूपा । जीव पाव निज सहज सरूपा ॥ जनकसुता के सुधि भामिनी । जानहि कहु करिबर-गामिनी ॥
mala darasana phala parama anūpā | jīva pāva nija sahaja sarūpā || janakasutā ke sudhi bhāminī | jānahi kahu karibara-gāminī ||
36.6 पंपा सरहि जाहु रघुराई । तहँ होइहि सुग्रीव मिताई ॥ सो सब कहिहि देव रघुबीरा । जानतहूँ पूछहु मतिधीरा ॥
paṃpā sarahi jāhu raghurāī | taham̐ hoihi sugrīva mitāī || so saba kahihi deva raghubīrā | jānatahūm̐ pūchahu matidhīrā ||
36.7 बार बार प्रभु पद सिर नाई । प्रेम सहित सब कथा सुनाई ॥
bāra bāra prabhu pada sira nāī | prema sahita saba kathā sunāī ||
36.छं॰ 1 छन्द कहि कथा सकल बिलोकि हरि-मुख, हृदयँ पद-पङ्कज धरे । तजि जोग-पावक देह हरि पद, लीन भइ जहँ नहिँ फिरे ॥ नर बिबिध-कर्म अधर्म बहु-मत, सोकप्रद सब त्यागहू । बिस्वास करि कह दास तुलसी राम-पद अनुरागहू ॥
kahi kathā sakala biloki hari-mukha, hṛdayam̐ pada-paṅkaja dhare | taji joga-pāvaka deha hari pada, līna bhai jaham̐ nahim̐ phire || nara bibidha-karma adharma bahu-mata, sokaprada saba tyāgahū | bisvāsa kari kaha dāsa tulasī rāma-pada anurāgahū ||
दो॰ 36 दोहा जाति-हीन अघ-जनम-महि, मुकुत कीन्ह असि नारि । महा-मन्द-मन सुख चहसि, ऐसे प्रभुहि बिसारि ॥
jāti-hīna agha-janama-mahi, mukuta kīnha asi nāri | mahā-manda-mana sukha cahasi, aise prabhuhi bisāri ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
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