अरण्यकाण्ड

अध्याय 34: श्रीराम शबरी के आश्रम में

6 श्लोक · 34 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम शबरी के आश्रम में

राम कबन्ध से आगे कहते हैं: सन्त कहते हैं कि शाप देता, मारता और कठोर बोलता ब्राह्मण भी पूज्य है। पाठ कहता है कि शील और गुण से हीन ब्राह्मण को भी पूजिए, पर गुणों और ज्ञान में प्रवीण शूद्र को नहीं। उसकी प्रीति से प्रसन्न होकर प्रभु ने उसे अपनी गति दी। फिर उदार राम शबरी के आश्रम पधारे। प्रभु को घर आया देख शबरी को गुरु मतंग मुनि के वचन याद आए। श्याम और गौर दोनों भाई सामने थे; शबरी चरणों से लिपट गई, प्रेम में मग्न, मुँह से वचन न निकला। आदर से चरण धोकर आसन दिया और अत्यन्त रसीले कन्द-मूल-फल लाकर दिए। प्रभु ने बार-बार सराहकर प्रेम से खाए।

34.1

सापत ताड़त परुष कहन्ता । विप्र पूज्य अस गावहिं सन्ता ॥
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना । सूद्र न गुन गन ज्ञान प्रबीना ॥

sāpata tār̤ata paruṣa kahantā | vipra pūjya asa gāvahiṃ santā ||
pūjia bipra sīla guna hīnā | sūdra na guna gana jñāna prabīnā ||

34.2

कहि निज धर्म ताहि समुझावा । निज पद प्रीति देखि मन भावा ॥
रघुपति चरन कमल सिरु नाई । गयउ गगन आपनि गति पाई ॥

kahi nija dharma tāhi samujhāvā | nija pada prīti dekhi mana bhāvā ||
raghupati carana kamala siru nāī | gayau gagana āpani gati pāī ||

34.3

ताहि देई गति राम उदारा । सबरी कें आस्त्रम पग धारा ॥
सबरी देखि राम गृहँ आये । मुनि के बचन समुझि जियँ भाये ॥

tāhi deī gati rāma udārā | sabarī keṃ āstrama paga dhārā ||
sabarī dekhi rāma gṛham̐ āye | muni ke bacana samujhi jiyam̐ bhāye ||

34.4

सरसिज लोचन बाहु विसाला । जटा मुकुट सिर उर बनमाला ॥
स्याम गौर सुन्दर दोउ भाई । सबरी परी चरन लपटाई ॥

sarasija locana bāhu visālā | jaṭā mukuṭa sira ura banamālā ||
syāma gaura sundara dou bhāī | sabarī parī carana lapaṭāī ||

34.5

प्रेम मगन मुख बचन न आवा । पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ॥
सादर जल लेइ चरन पखारे । पुनि सुन्दर आसन बैठारे ॥

prema magana mukha bacana na āvā | puni puni pada saroja sira nāvā ||
sādara jala lei carana pakhāre | puni sundara āsana baiṭhāre ||

दो॰ 34दोहा

कन्द मूल फल सुरस अति, दिये राम कह आनि ।
प्रेम सहित प्रभु खाये, बारम्बार बखानि ॥

kanda mūla phala surasa ati, diye rāma kaha āni |
prema sahita prabhu khāye, bārambāra bakhāni ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0