कोमल चित अति दीनदयाला । कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ॥
गीध अधम खग आमिष भोगी । गति दीन्ही जो जाचत जोगी ॥
komala cita ati dīnadayālā | kārana binu raghunātha kṛpālā ||
gīdha adhama khaga āmiṣa bhogī | gati dīnhī jo jācata jogī ||
5 श्लोक · 33 में से 46
शिवजी कहते हैं: रघुनाथ कोमल-चित्त, दीनदयालु और बिना कारण कृपा करने वाले हैं; मांसभक्षी अधम पक्षी गीध को भी उन्होंने वह गति दी जिसे योगी माँगते हैं। उमा, वे लोग अभागे हैं जो हरि को छोड़कर विषयों में अनुराग करते हैं। फिर दोनों भाई सीता को खोजते घने वन में चले, जहाँ लताएँ, वृक्ष, पक्षी, मृग, हाथी और सिंह भरे थे। मार्ग में प्रभु ने कबन्ध को मार गिराया, और उसने अपने शाप की बात कही: दुर्वासा ने मुझे शाप दिया था, प्रभु के चरण देखकर वह पाप मिट गया। राम गन्धर्व से कहते हैं: ब्राह्मण-कुल का द्रोही मुझे नहीं सुहाता। जो मन, कर्म और वचन से कपट छोड़कर ब्राह्मणों की सेवा करता है, उसके वश में मैं, ब्रह्मा, शिव और सब देवता रहते हैं।
कोमल चित अति दीनदयाला । कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ॥
गीध अधम खग आमिष भोगी । गति दीन्ही जो जाचत जोगी ॥
komala cita ati dīnadayālā | kārana binu raghunātha kṛpālā ||
gīdha adhama khaga āmiṣa bhogī | gati dīnhī jo jācata jogī ||
सुनहु उमा ते लोग अभागी । हरि तजि होहिँ बिषय अनुरागी ॥
पुनि सीतहि खोजत दोउ भाई । चले बिलोकत बन बहुताई ॥
sunahu umā te loga abhāgī | hari taji hohim̐ biṣaya anurāgī ||
puni sītahi khojata dou bhāī | cale bilokata bana bahutāī ||
सङ्कुल लता बिटप घन कानन । बहु खग मृग तहँ गज पञ्चानन ॥
आवत पन्थ कबंध निपाता । तेहिं सब कही साप के बाता ॥
saṅkula latā biṭapa ghana kānana | bahu khaga mṛga taham̐ gaja pañcānana ||
āvata pantha kabaṃdha nipātā | tehiṃ saba kahī sāpa ke bātā ||
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा । प्रभु-पद-पेखि मिटा से पापा ॥
सुनु गन्धर्व कहउँ मैं तोही । मोहि न सुहाइ ब्रह्म-कुल-द्रोही ॥
durabāsā mohi dīnhī sāpā | prabhu-pada-pekhi miṭā se pāpā ||
sunu gandharva kahaum̐ maiṃ tohī | mohi na suhāi brahma-kula-drohī ||
मन क्रम बचन कपट तजि, जो कर भूसुर सेव ।
मोहि समेत बिरञ्चि सिव, बस ताकें सब देव ॥
mana krama bacana kapaṭa taji, jo kara bhūsura seva |
mohi sameta birañci siva, basa tākeṃ saba deva ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0