गीध देह तजि धरि हरि रूपा । भूषन बहु पट पीत अनूपा ॥
स्याम-गात बिसाल भुज-चारी । अस्तुति करत नयन भरि बारी ॥
gīdha deha taji dhari hari rūpā | bhūṣana bahu paṭa pīta anūpā ||
syāma-gāta bisāla bhuja-cārī | astuti karata nayana bhari bārī ||
6 श्लोक · 32 में से 46
गीध-देह छोड़कर जटायु ने हरि का रूप धारण किया: श्याम शरीर, चार विशाल भुजाएँ, पीताम्बर और अनेक आभूषण; और नेत्रों में जल भरकर चार छन्दों में स्तुति की। जय हो राम की, जो अनुपम, निर्गुण भी और सगुण भी, गुणों के प्रेरक हैं, जिनके प्रचण्ड बाण दशशीश की भुजाएँ काटेंगे। मेघ-से श्याम, कमलमुख, भव-भय मिटाने वाले कृपालु राम को मैं नित्य नमन करता हूँ। वेद जिन्हें निरंजन, व्यापक ब्रह्म कहते हैं, मुनि जिन्हें ध्यान और योग से पाते हैं, वही करुणा और शोभा के समूह बनकर प्रकट हुए हैं, मेरे हृदय-कमल के भ्रमर। त्रिभुवन के स्वामी होकर भी दास के वश रहने वाले वे राम मेरे हृदय में बसें। अविरल भक्ति का वर माँगकर जटायु हरि-धाम गए, और राम ने अपने हाथों उनकी यथोचित क्रिया की।
गीध देह तजि धरि हरि रूपा । भूषन बहु पट पीत अनूपा ॥
स्याम-गात बिसाल भुज-चारी । अस्तुति करत नयन भरि बारी ॥
gīdha deha taji dhari hari rūpā | bhūṣana bahu paṭa pīta anūpā ||
syāma-gāta bisāla bhuja-cārī | astuti karata nayana bhari bārī ||
जय राम रूप अनूप निर्गुन, सगुन गुन प्रेरक सही ।
दससीस बाहु-प्रचंड-खंडन, चंड-सर मंडन मही ॥
पाथोद-गात सरोज-मुख राजीव आयत लोचनं ।
नित नौमि राम कृपाल बाहु बिलास भव-भय मोचनं ॥
jaya rāma rūpa anūpa nirguna, saguna guna preraka sahī |
dasasīsa bāhu-pracaṃḍa-khaṃḍana, caṃḍa-sara maṃḍana mahī ||
pāthoda-gāta saroja-mukha rājīva āyata locanaṃ |
nita naumi rāma kṛpāla bāhu bilāsa bhava-bhaya mocanaṃ ||
बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं ।
गोबिन्द गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥
जे राम मन्त्र जपन्त सन्त अनन्त जन मन रंजनं ।
नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि-खल-दल-गञ्जनं ॥
balamaprameyamanādimajamabyaktamekamagocaraṃ |
gobinda gopara dvaṃdvahara bigyānaghana dharanīdharaṃ ||
je rāma mantra japanta santa ananta jana mana raṃjanaṃ |
nita naumi rāma akāma priya kāmādi-khala-dala-gañjanaṃ ||
जेहि श्रुति निरञ्जन ब्रह्म व्यापक, बिरज अज कहि गावहीं ।
करि ध्यान ज्ञान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं ॥
सो प्रगट करुना कन्द सोभा बृन्द अग जग मोहई ।
मम-हृदय-पङ्कज-भृङ्ग अङ्ग अनङ्ग बहु छबि सोहई ॥
jehi śruti nirañjana brahma vyāpaka, biraja aja kahi gāvahīṃ |
kari dhyāna jñāna birāga joga aneka muni jehi pāvahīṃ ||
so pragaṭa karunā kanda sobhā bṛnda aga jaga mohaī |
mama-hṛdaya-paṅkaja-bhṛṅga aṅga anaṅga bahu chabi sohaī ||
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल, असम सम सीतल सदा ।
पस्यन्ति जं जोगी जतन करि, करत मन गो बस सदा ॥
सो राम रमा निवास सन्तत, दास-बस त्रिभुवन-धनी ।
मम उर बसहु से समन संसृति, जासु-कीरति पावनी ॥
jo agama sugama subhāva nirmala, asama sama sītala sadā |
pasyanti jaṃ jogī jatana kari, karata mana go basa sadā ||
so rāma ramā nivāsa santata, dāsa-basa tribhuvana-dhanī |
mama ura basahu se samana saṃsṛti, jāsu-kīrati pāvanī ||
अबिरल भगति माँगि बर, गीध गयउ हरि धाम ।
तेहि की क्रिया जथोचित, निज कर कीन्ही राम ॥
abirala bhagati mām̐gi bara, gīdha gayau hari dhāma |
tehi kī kriyā jathocita, nija kara kīnhī rāma ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0