अरण्यकाण्ड

अध्याय 30: सीता के लिए श्रीराम का विलाप और खोज

10 श्लोक · 30 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

सीता के लिए श्रीराम का विलाप और खोज

भाई को आते देख रघुपति बाहर से बड़ी चिन्ता दिखाते हैं: मेरी बात टालकर जानकी को अकेली छोड़ आए; वन में राक्षस फिरते हैं, मेरा मन कहता है सीता आश्रम में नहीं। लक्ष्मण चरण पकड़कर कहते हैं: नाथ, मेरा कोई दोष नहीं। गोदावरी-तट के आश्रम को जानकी-रहित देखकर प्रभु साधारण दीन मनुष्य-से व्याकुल हो जाते हैं: हा गुणों की खान जानकी, रूप, शील और व्रत में पवित्र। राम पक्षियों, मृगों और भौंरों से पूछते हैं: क्या तुमने मृगनयनी सीता को देखा? जिनकी शोभा सीता से हारती थी, आज मानो राज्य पाकर हर्षित हैं। तुलसीदास याद दिलाते हैं कि पूर्णकाम, अजन्मा, अविनाशी राम मनुष्य-चरित कर रहे हैं। आगे गृध्रपति पड़े मिले, राम-चरणों का स्मरण करते; प्रभु ने सिर पर कर-कमल फेरा और उनकी सब पीड़ा मिट गई।

30.1

रघुपति अनुजहि आवत देखी । बाहिज चिन्ता कीन्ह बिसेखी ॥
जनकसुता परिहरिहु अकेली । आयहु तात बचन मम पेली ॥

raghupati anujahi āvata dekhī | bāhija cintā kīnha bisekhī ||
janakasutā pariharihu akelī | āyahu tāta bacana mama pelī ||

30.2

निसिचर-निकर फिरहिँ बन माहीं । मम मन सीता आश्रम नाहीं ॥
गहि पद-कमल अनुज कर जोरी । कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी ॥

nisicara-nikara phirahim̐ bana māhīṃ | mama mana sītā āśrama nāhīṃ ||
gahi pada-kamala anuja kara jorī | kaheu nātha kachu mohi na khorī ||

30.3

अनुज समेत गये प्रभु तहवाँ । गोदावरि-तट आश्रम जहवाँ ॥
आश्रम देखि जानकी हीना । भए बिकल जस प्राकृत दीना ॥

anuja sameta gaye prabhu tahavām̐ | godāvari-taṭa āśrama jahavām̐ ||
āśrama dekhi jānakī hīnā | bhae bikala jasa prākṛta dīnā ||

30.4

हा गुन खानि जानकी सीता । रूप-सील ब्रत नेम पुनीता ॥
लछिमन समुझाये बहु भाँती । पूछत चले लता तरु पाँती ॥

hā guna khāni jānakī sītā | rūpa-sīla brata nema punītā ||
lachimana samujhāye bahu bhām̐tī | pūchata cale latā taru pām̐tī ||

30.5

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी । तुम्ह देखी सीला मृगनैनी ॥
खंजन सुक कपोत मग मीना । मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥

he khaga mṛga he madhukara śrenī | tumha dekhī sīlā mṛganainī ||
khaṃjana suka kapota maga mīnā | madhupa nikara kokilā prabīnā ||

30.6

कुन्द कली दाडिम दामिनी । कमल सरद ससि अहिभामिनी ॥
बरुन पास मनोज धनु हंसा । गज केहरि निज सुनत प्रसंसा ॥

kunda kalī dāḍima dāminī | kamala sarada sasi ahibhāminī ||
baruna pāsa manoja dhanu haṃsā | gaja kehari nija sunata prasaṃsā ||

30.7

श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं । नेकु न सङ्क सकुच मन माहीं ॥
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू । हरषे सकल पाई जनु राजू ॥

śrīphala kanaka kadali haraṣāhīṃ | neku na saṅka sakuca mana māhīṃ ||
sunu jānakī tohi binu ājū | haraṣe sakala pāī janu rājū ||

30.8

किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ॥
एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी । मनहुँ महा बिरही अति कामी ॥

kimi sahi jāta anakha tohi pāhīṃ | priyā begi pragaṭasi kasa nāhīṃ ||
ehi bidhi khojata bilapata svāmī | manahum̐ mahā birahī ati kāmī ||

30.9

पूरनकाम-राम सुख रासी । मनुज चरित कर अज अबिनासी ॥
आगे परा गीधपति देखा । सुमिरत राम-चरन जिन्ह रेखा ॥

pūranakāma-rāma sukha rāsī | manuja carita kara aja abināsī ||
āge parā gīdhapati dekhā | sumirata rāma-carana jinha rekhā ||

दो॰ 30दोहा

कर-सरोज सिर परसेउ, कृपासिन्धु रधुबीर ।
निरखि राम छवि-धाम-मुख, बिगत भई सब पीर ॥

kara-saroja sira paraseu, kṛpāsindhu radhubīra |
nirakhi rāma chavi-dhāma-mukha, bigata bhaī saba pīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0