अरण्यकाण्ड

अध्याय 28: यति-वेश में रावण सीता को हर ले जाता है

9 श्लोक · 28 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

यति-वेश में रावण सीता को हर ले जाता है

आर्त पुकार सुनकर सीता डरकर लक्ष्मण से बोलीं: जल्दी जाओ, भाई बड़े संकट में हैं। लक्ष्मण हँसकर बोले: माता, जिनकी भौंह के विलास से सृष्टि और प्रलय होते हैं, क्या वे स्वप्न में भी संकट में पड़ सकते हैं? तब सीता ने मर्म-भेदी वचन कहे, और हरि की प्रेरणा से लक्ष्मण की बुद्धि डोल गई। वन-देवताओं को सौंपकर वे चले गए। सूना देखकर रावण यति के वेश में आया। काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं: कुमार्ग पर पैर रखते ही तेज, बुद्धि और बल लेशमात्र नहीं रहते। सीता कहती हैं: तुम दुष्ट जैसे वचन बोलते हो। तब वह अपना रूप और नाम प्रकट करता है। सीता धीरज धरकर कहती हैं: खल, खड़ा रह, प्रभु आ गए; खरगोश सिंहनी चाहता है। क्रोध में रावण उन्हें रथ में बैठाकर आकाश-मार्ग से भागा।

28.1

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा । सोह चाप कर कटि तूनीरा ॥
आरत गिरा-सुनी जब सीता । कह लछिमन सन परम सभीता ॥

khala badhi turata phire raghubīrā | soha cāpa kara kaṭi tūnīrā ||
ārata girā-sunī jaba sītā | kaha lachimana sana parama sabhītā ||

28.2

जाहु बेगि सङ्कट अति भ्राता । लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ॥
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । सपनेहुँ सङ्कट परइ कि सोई ॥

jāhu begi saṅkaṭa ati bhrātā | lachimana bihasi kahā sunu mātā ||
bhṛkuṭi bilāsa sṛṣṭi laya hoī | sapanehum̐ saṅkaṭa parai ki soī ||

28.3

मरम बचन जब सीता बाली । हरि प्रेरित लछिमन मति डोला ॥
बन-दिसि-देव सौंपि सब काहू । चले जहाँ रावन-ससि-राहू ॥

marama bacana jaba sītā bālī | hari prerita lachimana mati ḍolā ||
bana-disi-deva sauṃpi saba kāhū | cale jahām̐ rāvana-sasi-rāhū ||

28.4

सून बीच दसकन्धर देखा । आवा निकट जती कें बेषा ॥
जा के डर सुर असुर डेराहीं । निसि न नींद दिन अन्न न खाहीं ॥

sūna bīca dasakandhara dekhā | āvā nikaṭa jatī keṃ beṣā ||
jā ke ḍara sura asura ḍerāhīṃ | nisi na nīṃda dina anna na khāhīṃ ||

28.5

सो दससीस स्वान की नाई । इत उत चितइ चला भड़िहाई ॥
इमि कुपन्थ पग देत खगेसा । रह न तेज बुधि बल लेसा ॥

so dasasīsa svāna kī nāī | ita uta citai calā bhar̤ihāī ||
imi kupantha paga deta khagesā | raha na teja budhi bala lesā ||

28.6

नाना विधि कहि कथा सुहाई । राजनीति भय प्रीति देखाई ॥
कह सीता सुनु जती गोसाँई । बोलेहु बचन दुष्ट की नाँई ॥

nānā vidhi kahi kathā suhāī | rājanīti bhaya prīti dekhāī ||
kaha sītā sunu jatī gosām̐ī | bolehu bacana duṣṭa kī nām̐ī ||

28.7

तब रावन निज-रूप देखावा । भई सभय जब नाम सुनावा ॥
कह सीता धरि धीरज गाढ़ा । आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा ॥

taba rāvana nija-rūpa dekhāvā | bhaī sabhaya jaba nāma sunāvā ||
kaha sītā dhari dhīraja gār̤hā | āi gayau prabhu rahu khala ṭhār̤hā ||

28.8

जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा । भएसि कालबस निसिचर-नाहा ॥
सुनत बचन दससीस रिसाना । मन महँ चरन बन्दि सुख माना ॥

jimi haribadhuhi chudra sasa cāhā | bhaesi kālabasa nisicara-nāhā ||
sunata bacana dasasīsa risānā | mana maham̐ carana bandi sukha mānā ||

दो॰ 28दोहा

क्रोधवन्त तब रावन, लीन्हिसि रथ बैठाइ ।
चला गगन-पथ आतुर, भयं रथ हाँकि न जाइ ॥

krodhavanta taba rāvana, līnhisi ratha baiṭhāi |
calā gagana-patha ātura, bhayaṃ ratha hām̐ki na jāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0