तेहि बन निकट दसानन गयऊ । तब मारीच कपटमृग भयऊ ॥
अति विचित्र कछु बरनि न जाई । कनक-देह मनि रचित बनाई ॥
tehi bana nikaṭa dasānana gayaū | taba mārīca kapaṭamṛga bhayaū ||
ati vicitra kachu barani na jāī | kanaka-deha mani racita banāī ||
10 श्लोक · 27 में से 46
उस वन के पास मारीच कपट-मृग बना, सोने का शरीर, मणियों से जड़ा। सीता ने देखकर कहा: हे कृपालु रघुवीर, इस मृग की छाल बहुत सुन्दर है; सत्यप्रतिज्ञ प्रभु, इसे मारकर चर्म ले आइए। सब कारण जानते हुए रघुपति देवताओं का काम सँवारने हर्ष से उठे। धनुष-बाण लेकर लक्ष्मण से कहा: वन में बहुत राक्षस फिरते हैं, सीता की रखवाली करना। मृग भागा और राम धनुष सजाकर पीछे दौड़े; जिन्हें वेद 'नेति' कहते हैं और शिव ध्यान में नहीं पाते, वे माया-मृग के पीछे दौड़ रहे हैं। तब राम ने बाण मारा, वह घोर पुकार करके गिरा, पहले लक्ष्मण का नाम लिया, फिर मन में राम का स्मरण किया। उसके भीतर का प्रेम पहचानकर प्रभु ने उसे मुनि-दुर्लभ गति दी।
तेहि बन निकट दसानन गयऊ । तब मारीच कपटमृग भयऊ ॥
अति विचित्र कछु बरनि न जाई । कनक-देह मनि रचित बनाई ॥
tehi bana nikaṭa dasānana gayaū | taba mārīca kapaṭamṛga bhayaū ||
ati vicitra kachu barani na jāī | kanaka-deha mani racita banāī ||
सीता परम रुचिर मृग देखा । अङ्ग अङ्ग-सुमनोहर-बेखा ॥
सुनहु देव रघुबीर कृपाला । एहि मृग कर अति-सुन्दर छाला ॥
sītā parama rucira mṛga dekhā | aṅga aṅga-sumanohara-bekhā ||
sunahu deva raghubīra kṛpālā | ehi mṛga kara ati-sundara chālā ||
सत्यसन्ध प्रभु बध करि एही । आनहु चर्म कहति बैदेही ॥
तब रघुपति जानत सब कारन । उठे हरषि सुर-काज सँवारन ॥
satyasandha prabhu badha kari ehī | ānahu carma kahati baidehī ||
taba raghupati jānata saba kārana | uṭhe haraṣi sura-kāja sam̐vārana ||
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा । करतल चाप रुचिर सर साधा ॥
प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई । फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई ॥
mṛga biloki kaṭi parikara bām̐dhā | karatala cāpa rucira sara sādhā ||
prabhu lachimanihi kahā samujhāī | phirata bipina nisicara bahu bhāī ||
सीता केरि करेहु रखवारी । बुधि बिबेक बल समय बिचारी ॥
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी । धाये राम सरासन साजी ॥
sītā keri karehu rakhavārī | budhi bibeka bala samaya bicārī ||
prabhuhi biloki calā mṛga bhājī | dhāye rāma sarāsana sājī ||
निगम नेति सिव ध्यान न पावा । मायामृग पाछें से धावा ॥
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई । कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई ॥
nigama neti siva dhyāna na pāvā | māyāmṛga pācheṃ se dhāvā ||
kabahum̐ nikaṭa puni dūri parāī | kabahum̐ka pragaṭai kabahum̐ chapāī ||
प्रगटत दुरत करत छल भूरी । एहि विधि प्रभुहि गयउ लेइ दूरी ॥
तब तकि राम कठिन सर मारा । धरनि परेउ करि घोर पुकारा ॥
pragaṭata durata karata chala bhūrī | ehi vidhi prabhuhi gayau lei dūrī ||
taba taki rāma kaṭhina sara mārā | dharani pareu kari ghora pukārā ||
लछिमन कर प्रथमहिँ लेइ नामा । पाछें सुमिरेसि मन महँ रामा ॥
प्रान तजत प्रगटेसि निज-देहा । सुमिरेसि राम समेत सनेहा ॥
lachimana kara prathamahim̐ lei nāmā | pācheṃ sumiresi mana maham̐ rāmā ||
prāna tajata pragaṭesi nija-dehā | sumiresi rāma sameta sanehā ||
अन्तर-प्रेम तासु पहिचाना । मुनि-दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना ॥
antara-prema tāsu pahicānā | muni-durlabha gati dīnhi sujānā ||
बिपुल सुमन सुर बरषहिँ, गावहिं प्रभु-गुन-गाथ ।
निज-पद दीन्ह असुर कह, दीनबन्धु रघुनाथ ॥
bipula sumana sura baraṣahim̐, gāvahiṃ prabhu-guna-gātha |
nija-pada dīnha asura kaha, dīnabandhu raghunātha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0