अरण्यकाण्ड

अध्याय 26: मारीच राम के बाण से मरना चुनता है

6 श्लोक · 26 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

मारीच राम के बाण से मरना चुनता है

मारीच कहता है: कुल की कुशल विचारकर घर जाओ। सुनते ही रावण जल उठा और गालियाँ देकर बोला: बता संसार में मेरे समान योद्धा कौन है? तब मारीच ने मन में विचारा कि शस्त्रधारी, भेदी और स्वामी जैसे नौ लोगों से विरोध में कल्याण नहीं। दोनों ओर अपना मरण देखकर उसने रघुनायक की शरण तकी: उत्तर दूँ तो यह अभागा मुझे मारेगा, फिर राम के बाण से क्यों न मरूँ? राम-चरणों के अटूट प्रेम के साथ वह रावण के संग चला, मन का हर्ष छिपाए: आज परम स्नेही के दर्शन करूँगा। जिनका क्रोध भी निर्वाण देता है, वे हरि अपने हाथ से बाण चढ़ाकर मुझे मारेंगे। धनुष-बाण लिए मेरे पीछे दौड़ेंगे और मैं बार-बार मुड़कर प्रभु को देखूँगा। मेरे समान धन्य कोई नहीं।

26.1

जाहु भवन कुल कुसल बिचारी । सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी ॥
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा । कहु जग मोहि समान को जोधा ॥

jāhu bhavana kula kusala bicārī | sunata jarā dīnhisi bahu gārī ||
guru jimi mūr̤ha karasi mama bodhā | kahu jaga mohi samāna ko jodhā ||

26.2

तब मारीच हृदयँ अनुमाना । नवहि बिरोधें नहिँ कल्याना ॥
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी । बैद बन्दि कवि भानस-गुनी ॥

taba mārīca hṛdayam̐ anumānā | navahi birodheṃ nahim̐ kalyānā ||
sastrī marmī prabhu saṭha dhanī | baida bandi kavi bhānasa-gunī ||

26.3

उभय भाँति देखा निज मरना । तब ताकिसि रघुनायक सरना ॥
उत्तर देत मोहि बधब अभागें । कस न मरौं रघुपति-सर लागें ॥

ubhaya bhām̐ti dekhā nija maranā | taba tākisi raghunāyaka saranā ||
uttara deta mohi badhaba abhāgeṃ | kasa na marauṃ raghupati-sara lāgeṃ ||

26.4

अस जियँ जानि दसानन सङ्गा । चला राम-पद-प्रेम अभंगा ॥
मन अति हरष जनाव न तेही । आजु देखिहउँ परम सनेही ॥

asa jiyam̐ jāni dasānana saṅgā | calā rāma-pada-prema abhaṃgā ||
mana ati haraṣa janāva na tehī | āju dekhihaum̐ parama sanehī ||

26.छं॰ 1छन्द

निज परम प्रीतम देखि लोचन, सुफल करि सुख पाइहौं ।
श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत-पद मन लाइहौँ ॥
निर्बान-दायक क्रोध जा कर, भगति अबसहि बस करी ।
निज पानि सर सन्धानि सो मोहि, बधिहि सुखसागर हरी ॥

nija parama prītama dekhi locana, suphala kari sukha pāihauṃ |
śrī sahita anuja sameta kṛpāniketa-pada mana lāihaum̐ ||
nirbāna-dāyaka krodha jā kara, bhagati abasahi basa karī |
nija pāni sara sandhāni so mohi, badhihi sukhasāgara harī ||

दो॰ 26दोहा

मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान ।
फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ, धन्य न मो सम आन ॥

mama pācheṃ dhara dhāvata dhareṃ sarāsana bāna |
phiri phiri prabhuhi bilokihaum̐, dhanya na mo sama āna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0