अरण्यकाण्ड

अध्याय 2: जयन्त को राम-चरण के सिवा शरण नहीं

8 श्लोक · 2 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

जयन्त को राम-चरण के सिवा शरण नहीं

मन्त्र से प्रेरित वह सींक ब्रह्मास्त्र बनकर कौए के पीछे दौड़ती है। जयन्त अपना रूप धरकर पिता इन्द्र के पास जाता है, पर राम-द्रोही को वे भी नहीं रखते। सुदर्शन चक्र से डरे दुर्वासा की भाँति वह ब्रह्मलोक, शिवपुर और सब लोकों में भटकता है, कोई उसे बैठने तक को नहीं कहता। शिवजी उमा से कहते हैं कि जो रघुवीर से विमुख है, उसके लिए माता मृत्यु, पिता यम, अमृत विष, मित्र सौ शत्रुओं-सा और गंगा वैतरणी हो जाती है। कोमल-चित्त नारद दया करके उसे राम के पास भेजते हैं। जयन्त चरण पकड़कर पुकारता है कि उसने अपने कर्म का फल पाया, अब शरण में आया है। वध उचित होते हुए भी कृपालु प्रभु उसकी केवल एक आँख लेकर उसे छोड़ देते हैं।

2.1

प्रेरित मन्त्र ब्रह्म-सर धावा । चला भाजि बायस भय पावा ॥
धरि निज-रूप गयउ पितु पाहीं । राम बिमुख राखा तेहि नाहीं ॥

prerita mantra brahma-sara dhāvā | calā bhāji bāyasa bhaya pāvā ||
dhari nija-rūpa gayau pitu pāhīṃ | rāma bimukha rākhā tehi nāhīṃ ||

2.2

भा निरास उपजी मन त्रासा । जथा चक्र-भय रिषि दुर्वासा ॥
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका । फिरा अमित ब्याकुल भय सोका ॥

bhā nirāsa upajī mana trāsā | jathā cakra-bhaya riṣi durvāsā ||
brahmadhāma sivapura saba lokā | phirā amita byākula bhaya sokā ||

2.3

काहूँ बैठन कहा न ओही । राखि को सकइ राम कर द्रोही ॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना । सुधा होइ बिष सुनु, हरिजाना ॥

kāhūm̐ baiṭhana kahā na ohī | rākhi ko sakai rāma kara drohī ||
mātu mṛtyu pitu samana samānā | sudhā hoi biṣa sunu, harijānā ||

2.4

मित्र करइ सत-रिपु कै करनी । ता कहँ बिबुधनदी-बैतरनी ॥
सब जग तेहि अनलहु ते ताता । जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता ॥

mitra karai sata-ripu kai karanī | tā kaham̐ bibudhanadī-baitaranī ||
saba jaga tehi analahu te tātā | jo raghubīra bimukha sunu bhrātā ||

2.5

नारद देखा बिकल जयन्ता । लागि दया कोमल चित सन्ता ॥
पठवा तुरत राम पहिँ ताही । कहेसि पुकारि प्रनत-हित पाही ॥

nārada dekhā bikala jayantā | lāgi dayā komala cita santā ||
paṭhavā turata rāma pahim̐ tāhī | kahesi pukāri pranata-hita pāhī ||

2.6

आतुर सभय गहेसि पद जाई । त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ॥
अतुलित-बल अतुलित-प्रभुताई । मैं मति-मन्द जानि नहिं पाई ॥

ātura sabhaya gahesi pada jāī | trāhi trāhi dayāla raghurāī ||
atulita-bala atulita-prabhutāī | maiṃ mati-manda jāni nahiṃ pāī ||

2.7

निज कृत करम जनित फल पायउँ । अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ ॥
सुनि कृपाल अति-आरत-बानी । एक नयन करि तजा भवानी ॥

nija kṛta karama janita phala pāyaum̐ | aba prabhu pāhi sarana taki āyaum̐ ||
suni kṛpāla ati-ārata-bānī | eka nayana kari tajā bhavānī ||

2.सो॰ 2सोरठा

कीन्ह मोह-बस द्रोह, जद्यपि तेहि कर बध उचित ।
प्रभु छाड़ेउ करि छोह, को कृपाल रघुबीर सम ॥

kīnha moha-basa droha, jadyapi tehi kara badha ucita |
prabhu chār̤eu kari choha, ko kṛpāla raghubīra sama ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0