अरण्यकाण्ड

अध्याय 13: अगस्त्य का परामर्श और पंचवटी की राह

10 श्लोक · 13 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

अगस्त्य का परामर्श और पंचवटी की राह

राम अगस्त्य से कहते हैं: आप जानते हैं मैं क्यों आया हूँ; वह मन्त्र दीजिए जिससे मुनि-द्रोहियों को मारूँ। मुनि मुस्कराते हैं। आपकी माया गूलर का विशाल वृक्ष है, जिसके हर फल में अनेक ब्रह्माण्ड हैं; उन फलों को खाने वाला काल भी आपसे डरता है, फिर भी आप मनुष्य की भाँति पूछते हैं। मेरा वर यही है कि सीता और अनुज सहित मेरे हृदय में बसिए, अविरल भक्ति और सत्संग दीजिए। आपको अखण्ड ब्रह्म जानकर भी मैं बार-बार सगुण ब्रह्म में ही रमता हूँ। पंचवटी नाम का एक पावन स्थान है; दण्डक वन को पवित्र कीजिए, मुनि का उग्र शाप हरिए और वहीं रहिए। राम चले, गृध्रराज जटायु से प्रीति हुई, और गोदावरी के पास पर्णकुटी बनाकर रहने लगे।

13.1

तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं । तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही ॥
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ । ताते तात न कहि समुझायउँ ॥

taba raghubīra kahā muni pāhīṃ | tumha sana prabhu durāva kachu nāhī ||
tumha jānahu jehi kārana āyaum̐ | tāte tāta na kahi samujhāyaum̐ ||

13.2

अब सो मन्त्र देहु प्रभु मोही । जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही ॥
मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी । पूछेहु नाथ मोहि का जानी ॥

aba so mantra dehu prabhu mohī | jehi prakāra mārauṃ munidrohī ||
muni musakāne suni prabhu bānī | pūchehu nātha mohi kā jānī ||

13.3

तुम्हरेइँ भजन-प्रभाव अघारी । जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी ॥
ऊमरि तरु बिसाल तब माया । पल ब्रह्मांड अनेक निकाया ॥

tumhareim̐ bhajana-prabhāva aghārī | jānaum̐ mahimā kachuka tumhārī ||
ūmari taru bisāla taba māyā | pala brahmāṃḍa aneka nikāyā ||

13.4

जीव चराचर जन्तु समाना । भीतर बसहि न जानहिँ आना ॥
ते फल भच्छक कठिन कराला । तव भयं डरत सदा सोउ काला ॥

jīva carācara jantu samānā | bhītara basahi na jānahim̐ ānā ||
te phala bhacchaka kaṭhina karālā | tava bhayaṃ ḍarata sadā sou kālā ||

13.5

ते तुम्ह सकल-लोकपति-साँई । पूँछेहु मोहि मनुज की नाँई ॥
यह बर माँगउँ कृपानिकेता । बसहु हृदयँ श्री-अनुज-समेता ॥

te tumha sakala-lokapati-sām̐ī | pūm̐chehu mohi manuja kī nām̐ī ||
yaha bara mām̐gaum̐ kṛpāniketā | basahu hṛdayam̐ śrī-anuja-sametā ||

13.6

अबिरल भगति बिरति सतसंगा । चरन-सरोरुह प्रीति अभङ्गा ॥
जद्यपि ब्रह्म अखंड अनन्ता । अनुभव गम्य भजहिँ जेहि सन्ता ॥

abirala bhagati birati satasaṃgā | carana-saroruha prīti abhaṅgā ||
jadyapi brahma akhaṃḍa anantā | anubhava gamya bhajahim̐ jehi santā ||

13.7

अस तव रूप बखानउँ जानउँ । फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ ॥
सन्तत दासन्ह देहु बड़ाई । ता तँ माहि पूछेहु रघुराई ॥

asa tava rūpa bakhānaum̐ jānaum̐ | phiri phiri saguna brahma rati mānaum̐ ||
santata dāsanha dehu bar̤āī | tā tam̐ māhi pūchehu raghurāī ||

13.8

है प्रभु परम-मनोहर ठाऊँ । पावन पंचबटी तेहि नाऊँ ॥
दंडक-गन पुनीत प्रभु करहू । उग्र-साप मुनिबर कर हरहू ॥

hai prabhu parama-manohara ṭhāūm̐ | pāvana paṃcabaṭī tehi nāūm̐ ||
daṃḍaka-gana punīta prabhu karahū | ugra-sāpa munibara kara harahū ||

13.9

बास करहु तहँ रघुकुल-राया । कीजिय सकल मुनिन्ह पर दाया ॥
चले राम मुनि आयसु पाई । तुरतहिं पंचबटी निअराई ॥

bāsa karahu taham̐ raghukula-rāyā | kījiya sakala muninha para dāyā ||
cale rāma muni āyasu pāī | turatahiṃ paṃcabaṭī niarāī ||

दो॰ 13दोहा

गीधराज साँ भैंट भइ, बहु विधि प्रीति बढ़ाइ ।
गोदावरी निकट प्रभु, रहे परन-गृह छाइ ॥

gīdharāja sām̐ bhaiṃṭa bhai, bahu vidhi prīti bar̤hāi |
godāvarī nikaṭa prabhu, rahe parana-gṛha chāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0