जब तैं राम कीन्ह तहँ बासा । सुखी भये मुनि बीती नासा ॥
गिरि बन नदीं ताल छबि छाए । दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाये ॥
jaba taiṃ rāma kīnha taham̐ bāsā | sukhī bhaye muni bītī nāsā ||
giri bana nadīṃ tāla chabi chāe | dina dina prati ati hauhiṃ suhāye ||
5 श्लोक · 14 में से 46
जब से राम ने पंचवटी में वास किया, मुनि सुखी और निर्भय हो गए। पर्वत, वन, नदियाँ और सरोवर दिन-दिन अधिक सुहावने होते गए; पक्षी और मृग आनन्दित रहते, भौंरे मधुर गुंजार करते। जिस वन में रघुवीर प्रत्यक्ष विराजते हैं, उसका वर्णन सर्पराज शेष भी नहीं कर सकते। एक बार प्रभु सुख से बैठे थे, तब लक्ष्मण ने छलरहित वचन कहे: हे देवताओं, मनुष्यों, मुनियों और समस्त चराचर के स्वामी, मैं आपसे अपने प्रभु की भाँति पूछता हूँ। मुझे समझाकर कहिए, ताकि सब छोड़कर आपकी चरण-धूलि की सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और माया क्या हैं, और वह भक्ति कौन-सी है जिसके कारण आप दया करते हैं? ईश्वर और जीव का भेद भी समझाइए, जिससे चरणों में प्रेम हो और शोक, मोह और भ्रम मिट जाएँ।
जब तैं राम कीन्ह तहँ बासा । सुखी भये मुनि बीती नासा ॥
गिरि बन नदीं ताल छबि छाए । दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाये ॥
jaba taiṃ rāma kīnha taham̐ bāsā | sukhī bhaye muni bītī nāsā ||
giri bana nadīṃ tāla chabi chāe | dina dina prati ati hauhiṃ suhāye ||
खग-मृग-वृन्द अनन्दित रहहीं । मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं ॥
सो बन बरनि न सक अहिराजा । जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा ॥
khaga-mṛga-vṛnda anandita rahahīṃ | madhupa madhura gaṃjata chabi lahahīṃ ||
so bana barani na saka ahirājā | jahām̐ pragaṭa raghubīra birājā ||
एक बार प्रभु सुख-आसीना । लछिमन बचन कहे छलहीना ॥
सुर नर मुनि सचराचर साँई । मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई ॥
eka bāra prabhu sukha-āsīnā | lachimana bacana kahe chalahīnā ||
sura nara muni sacarācara sām̐ī | maiṃ pūchaum̐ nija prabhu kī nāī ||
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा । सब तजि करउँ चरन-रज सेवा ॥
कहहु ज्ञान बिराग अरु माया । कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया ॥
mohi samujhāi kahahu soi devā | saba taji karaum̐ carana-raja sevā ||
kahahu jñāna birāga aru māyā | kahahu so bhagati karahu jehiṃ dāyā ||
ईस्वर जीव भेद प्रभु, सकल कहहु समुझाइ ।
जातें होइ चरन रति, सोक मोह भ्रम जाइ ॥
īsvara jīva bheda prabhu, sakala kahahu samujhāi |
jāteṃ hoi carana rati, soka moha bhrama jāi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0