उद्योग पर्व

अध्याय 174: अम्बा बताती है कि उसका मन शाल्व का है

इति श्रीमन्महाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यनपर्वणि चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥

10 श्लोक · 174 में से 196

इस अध्याय में क्या होता है

अम्बा बताती है कि उसका मन शाल्व का है

भीष्म आगे कहते हैं। उन्होंने सत्यवती को बताया कि वे विचित्रवीर्य के लिए काशिराज की कन्याएँ जीत लाए हैं। सत्यवती ने हर्ष के आँसुओं के साथ उनका सिर सूँघा और विजय पर आशीर्वाद दिया। उनकी अनुमति से विवाह की तैयारी हुई। तब काशिराज की बड़ी पुत्री अम्बा ने लज्जा के साथ कहा कि आप धर्मज्ञ और सब शास्त्रों के ज्ञाता हैं, मेरी बात सुनकर धर्म के अनुसार करें। मैंने मन ही मन सौभपति शाल्व को पति चुन लिया है, और उन्होंने भी पिता से छिपकर मुझे वरा है। जिसका मन किसी और का हो, ऐसी कन्या को कोई कुरुवंशी अपने घर में कैसे रखेगा? शाल्वराज अवश्य मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। वह पृथ्वी पर सत्यव्रती कहे जाने वाले भीष्म से दया करके उसे जाने देने की विनती करती है।

भीष्म उवाच

174.1

ततोऽहं भरतश्रेष्ठ मातरं वीरमातरम् ।
अभिगम्योपसंगृह्य दाशेयीमिदमब्रुवम्

tato'haṃ bharataśreṣṭha mātaraṃ vīramātaram |
abhigamyopasaṃgṛhya dāśeyīmidamabruvam

174.2

इमाः काशिपतेः कन्या मया निर्जित्य पार्थिवान् ।
विचित्रवीर्यस्य कृते वीर्यशुल्का हृता इति

imāḥ kāśipateḥ kanyā mayā nirjitya pārthivān |
vicitravīryasya kṛte vīryaśulkā hṛtā iti

174.3

ततो मूर्धन्युपाघ्राय पर्यश्रुनयना नृप ।
आह सत्यवती हृष्टा दिष्ट्या पुत्र जितं त्वया

tato mūrdhanyupāghrāya paryaśrunayanā nṛpa |
āha satyavatī hṛṣṭā diṣṭyā putra jitaṃ tvayā

174.4

सत्यवत्यास्त्वनुमते विवाहे समुपस्थिते ।
उवाच वाक्यं सव्रीडा ज्येष्ठा काशिपतेः सुता

satyavatyāstvanumate vivāhe samupasthite |
uvāca vākyaṃ savrīḍā jyeṣṭhā kāśipateḥ sutā

174.5

भीष्म त्वमसि धर्मज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ।
श्रुत्वा च वचनं धर्म्यं मह्यं कर्तुमिहार्हसि

bhīṣma tvamasi dharmajñaḥ sarvaśāstraviśāradaḥ |
śrutvā ca vacanaṃ dharmyaṃ mahyaṃ kartumihārhasi

174.6

मया साल्वपत्तिः पूर्वं मनसाऽभिवृतो वरः ।
तेन चास्मि वृता पूर्वं रहस्यविदिते पितुः

mayā sālvapattiḥ pūrvaṃ manasā'bhivṛto varaḥ |
tena cāsmi vṛtā pūrvaṃ rahasyavidite pituḥ

174.7

कथं मामन्यकामां त्वं राजधर्ममतीत्य वै ।
वासयेथा गृहे भीष्म कौरवः सन्विशेषतः

kathaṃ māmanyakāmāṃ tvaṃ rājadharmamatītya vai |
vāsayethā gṛhe bhīṣma kauravaḥ sanviśeṣataḥ

174.8

एतद्बुद्ध्या विनिश्चित्य मनसा भरतर्षभ ।
यत्क्षमं ते महाबाहो तदिहारब्धुमर्हसि

etadbuddhyā viniścitya manasā bharatarṣabha |
yatkṣamaṃ te mahābāho tadihārabdhumarhasi

174.9

स मां प्रतीक्षते व्यक्तं साल्वराजो विशांपते ।
तस्मान्मां त्वं कुरुश्रेष्ठ समनुज्ञातुमर्हसि

sa māṃ pratīkṣate vyaktaṃ sālvarājo viśāṃpate |
tasmānmāṃ tvaṃ kuruśreṣṭha samanujñātumarhasi

174.10

कृपां कुरु महाबाहो मयि धर्मभृतां वर ।
त्वं हि सत्यव्रतो वीर पृथिव्यामिति नः श्रुतम्

kṛpāṃ kuru mahābāho mayi dharmabhṛtāṃ vara |
tvaṃ hi satyavrato vīra pṛthivyāmiti naḥ śrutam

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