शान्ति पर्व

अध्याय 373: सूर्य स्वर्ग पहुँचे उञ्छवृत्ति मुनि को बताते हैं

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि त्रिसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥

6 श्लोक · 373 में से 372

इस अध्याय में क्या होता है

सूर्य स्वर्ग पहुँचे उञ्छवृत्ति मुनि को बताते हैं

सूर्य नागों को उत्तर देते हैं। वह तेज न देवता था, न असुर, न नाग। वह एक मुनि था जो उञ्छवृत्ति व्रत से सिद्ध हुआ, अर्थात कटाई के बाद खेतों में गिरे दाने बीनकर जीता था, और इसी से स्वर्ग गया। वह कन्द-फल, गिरे पत्तों, जल और फिर वायु पर रहा था। उसने वैदिक संहिताओं से शिव की स्तुति की और स्वर्गद्वार के लिए प्रयत्न किया। आसक्ति और कामना से रहित, केवल बीने अन्न पर जीने वाला वह सब प्राणियों के हित में लगा रहता था। नाग ब्राह्मण से कहते हैं कि यही आश्चर्य मैंने देखा: एक मनुष्य पूर्ण सिद्ध होकर सिद्धों की गति को पहुँचा और अब सूर्य के साथ पृथ्वी की परिक्रमा करता है।

सूर्य उवाच

373.1

नैष देवोऽनिलसखो नासुरो न च यन्नगः ।
उञ्छवृत्तिव्रते सिद्धो मुनिरेष दिवं गतः

naiṣa devo'nilasakho nāsuro na ca yannagaḥ |
uñchavṛttivrate siddho munireṣa divaṃ gataḥ

373.2

एष मूलफलाहारः शीर्णपर्णाशनस्तथा ।
अब्भक्षो वायुभक्षश्च आसीद्विप्रः समाहितः

eṣa mūlaphalāhāraḥ śīrṇaparṇāśanastathā |
abbhakṣo vāyubhakṣaśca āsīdvipraḥ samāhitaḥ

373.3

भवश्चानेन विप्रेण संहिताभिरभिष्टुतः ।
स्वर्गद्वारे कृतोद्योगो येनासौ त्रिविदं गतः

bhavaścānena vipreṇa saṃhitābhirabhiṣṭutaḥ |
svargadvāre kṛtodyogo yenāsau trividaṃ gataḥ

373.4

असंगतिरनाकाङ्क्षी नित्यमुञ्छशिलाशनः ।
सर्वभूतहिते युक्त एष विप्रो भुजंगमाः

asaṃgatiranākāṅkṣī nityamuñchaśilāśanaḥ |
sarvabhūtahite yukta eṣa vipro bhujaṃgamāḥ

373.5

न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च पन्नगाः ।
प्रभवन्तीह भूतानां प्राप्तानामुत्तमां गतिम्

na hi devā na gandharvā nāsurā na ca pannagāḥ |
prabhavantīha bhūtānāṃ prāptānāmuttamāṃ gatim

373.6

एतदेवंविधं दृष्टमाश्चर्यं तत्र मे द्विज ।
संसिद्धो मानुषः कामं योसौ सिद्धगतिं गतः ।
सूर्येण सहितो ब्रह्मन्पृथिवीं परिवर्तते

etadevaṃvidhaṃ dṛṣṭamāścaryaṃ tatra me dvija |
saṃsiddho mānuṣaḥ kāmaṃ yosau siddhagatiṃ gataḥ |
sūryeṇa sahito brahmanpṛthivīṃ parivartate

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