सभा पर्व

अध्याय 42: सहदेव की राजाओं को चुनौती

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अर्घाहरणपर्वणि द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥

9 श्लोक · 42 में से 103

इस अध्याय में क्या होता है

सहदेव की राजाओं को चुनौती

भीष्म की बात सुनकर शिशुपाल क्रोधित हुआ। यह देखकर सहदेव बोले कि यह पूजा मैंने सोच समझकर की है। श्रीकृष्ण सब राजाओं के गुरु हैं, उनके समान दूसरा कोई नहीं, इसलिए सबको इसे मान लेना चाहिए। जो कोई राजा अपनी सेना और वाहनों सहित इसे सह न सके, वह तुरन्त युद्ध के लिए निकले, क्योंकि मैंने उसके सिर पर पैर रख दिया है। वह उत्तर दे। अभिमानी और बलवान राजाओं में से कोई कुछ न बोला। शिशुपाल की स्वभाव से लाल आँखें क्रोध से और लाल हो गईं। उसका क्रोध देखकर भीष्म ने उससे और सब राजाओं से फिर कहा कि सहदेव ने केशव के विषय में जो कहा वह सत्य है, और वे इस पर और बताएँगे।

वैशम्पायन उवाच

42.1

गाङ्गेयेनैवमुक्तस्तु शिशुपालश्चुकोप तम् ।
क्रुद्धं सुनीथं दृष्ट्वाऽथ सहदेवोऽब्रवीत्तदा

gāṅgeyenaivamuktastu śiśupālaścukopa tam |
kruddhaṃ sunīthaṃ dṛṣṭvā'tha sahadevo'bravīttadā

42.2

मतिपूर्वमिदं सर्वं चेदिराज मया कृतम् ।
तन्मे निगदतस्तत्त्वं कारणादत्र मे शृणु

matipūrvamidaṃ sarvaṃ cedirāja mayā kṛtam |
tanme nigadatastattvaṃ kāraṇādatra me śṛṇu

42.3

स पार्थिवानां सर्वेषां गुरुः कृष्णोऽपरो न हि ।
तस्मादभ्यर्चितोऽस्माभिः सर्वे संमन्तुमर्हथ

sa pārthivānāṃ sarveṣāṃ guruḥ kṛṣṇo'paro na hi |
tasmādabhyarcito'smābhiḥ sarve saṃmantumarhatha

42.4

यो वा सहते कश्चिद्राज्ञां सबलवाहनः ।
क्षिप्रं युद्धाय निर्यातु तस्य मूर्ध्न्याहितं पदम्

yo vā sahate kaścidrājñāṃ sabalavāhanaḥ |
kṣipraṃ yuddhāya niryātu tasya mūrdhnyāhitaṃ padam

42.5

एवमुक्तो मया हेतुरुत्तरं प्रब्रवीतु मे ।
(वैशम्पायन उवाच)
ततो न व्याजहारैषां कश्चिद्बुद्धिमतां सताम्

evamukto mayā heturuttaraṃ prabravītu me |
(vaiśampāyana uvāca)
tato na vyājahāraiṣāṃ kaścidbuddhimatāṃ satām

42.6

मानिनां बलिनां राज्ञां मध्ये सन्दर्शिते पदे ।
एवमुक्ते सुनीथस्य सहदेवेन केशवे

mānināṃ balināṃ rājñāṃ madhye sandarśite pade |
evamukte sunīthasya sahadevena keśave

42.7

स्वभावरक्ते नयने कोपाद्रक्ततरे कृते ।
तस्य कोपं समुद्भूतं ज्ञात्वा भीष्मः प्रतापवान्

svabhāvarakte nayane kopādraktatare kṛte |
tasya kopaṃ samudbhūtaṃ jñātvā bhīṣmaḥ pratāpavān

42.8

आचचक्षे पुनस्तस्मै कृष्णस्यैवोत्तरान्गुणान् ।
स सुनीथं समामन्त्र्य तांश्च सर्वान्महीक्षितः

ācacakṣe punastasmai kṛṣṇasyaivottarānguṇān |
sa sunīthaṃ samāmantrya tāṃśca sarvānmahīkṣitaḥ

42.9

उवाच वदतां श्रेष्ठं इदं मतिमतां वरः ।
सहदेवेन राजानो यदुक्तं केशवं प्रति ।
तत्तथेति विजानीध्वं भूयश्चात्र विबोधत

uvāca vadatāṃ śreṣṭhaṃ idaṃ matimatāṃ varaḥ |
sahadevena rājāno yaduktaṃ keśavaṃ prati |
tattatheti vijānīdhvaṃ bhūyaścātra vibodhata

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