अनुशासन पर्व

अध्याय 224: कर्म का फल कहाँ भोगा जाता है

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतुर्विंसत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥

11 श्लोक · 224 में से 274

इस अध्याय में क्या होता है

कर्म का फल कहाँ भोगा जाता है

उमा कहती हैं कि उन्होंने उनके वचन अमृत की तरह ग्रहण किए हैं। शुभ हो या अशुभ, हर कर्म अपने कर्ता के पीछे वैसे ही चलता है जैसे बछड़ा माँ के पीछे और जल नीचे की ओर, और कोई कर्म नष्ट नहीं होता। फिर वे एक और प्रश्न करती हैं। मनुष्य सुकर्म का फल कब भोगता है, इसी जन्म में या मरने के बाद? महादेव इसे मनुष्यों में सबसे गुप्त बात कहते हैं। यहाँ लोग पिछली देह के कर्म भोगते हैं, और यहाँ किया हुआ अगले जन्म में फलता है। यह नियम केवल मनुष्यों के लिए है। तप के बल से अमर देवता और असुर एक ही शरीर में अपने कर्मों का फल भोगते हैं। ये श्लोक पिछले अध्याय के अन्त को दोहराते हैं।

उमोवाच

224.1

भगवन्देवदेवेश लोकपालनमस्कृत ।
प्रसादात्ते महादेव श्रुता मे कर्मणां गतिः

bhagavandevadeveśa lokapālanamaskṛta |
prasādātte mahādeva śrutā me karmaṇāṃ gatiḥ

224.2

सङ्गृहीतं च तत्सर्वं तत्वतोऽमृतसंनिभम् ।
कर्मणा ग्रथितं सर्वमिति वेद शुभाशुभम्

saṅgṛhītaṃ ca tatsarvaṃ tatvato'mṛtasaṃnibham |
karmaṇā grathitaṃ sarvamiti veda śubhāśubham

224.3

गोवत्सवच्च जननीं निम्नं सलिलवत्तथा ।
कर्तारं स्वकृतं कर्म नित्यं तदनुधावति

govatsavacca jananīṃ nimnaṃ salilavattathā |
kartāraṃ svakṛtaṃ karma nityaṃ tadanudhāvati

224.4

कृतस्य कर्मणश्चेह नाशो नास्तीति निश्चयः ।
अशुभस्य शुभस्यापि तदप्युपगतं मया

kṛtasya karmaṇaśceha nāśo nāstīti niścayaḥ |
aśubhasya śubhasyāpi tadapyupagataṃ mayā

224.5

भूय एव महादेव वरद प्रीतिवर्धन ।
कर्मणां गतिमाश्रित्य संशयान्मोक्तुमर्हसि

bhūya eva mahādeva varada prītivardhana |
karmaṇāṃ gatimāśritya saṃśayānmoktumarhasi

महेश्वर उवाच

224.6

यत्ते विवक्षितं देवि गुह्यमप्यसितेक्षणे ।
तत्सर्वं निर्विशंका त्वं पृच्छ मां शुभलक्षणे

yatte vivakṣitaṃ devi guhyamapyasitekṣaṇe |
tatsarvaṃ nirviśaṃkā tvaṃ pṛccha māṃ śubhalakṣaṇe

उमोवाच

224.7

एवं व्यवस्थिते लोके कर्ममां वृषभध्वज ।
कृत्वा तत्पुरुषः कर्म शुभं वा यदि वेतरत्

evaṃ vyavasthite loke karmamāṃ vṛṣabhadhvaja |
kṛtvā tatpuruṣaḥ karma śubhaṃ vā yadi vetarat

224.8

कर्मणः सुकृतस्येह कदा भुङ्क्ते फलं पुनः ।
इह वा प्रेत्य वा देव तन्मे शंसितुमर्हसि

karmaṇaḥ sukṛtasyeha kadā bhuṅkte phalaṃ punaḥ |
iha vā pretya vā deva tanme śaṃsitumarhasi

महेश्वर उवाच

224.9

स्थाने संशयितं देवि तद्धि गुह्यतमं नृषु ।
त्वत्प्रियार्थं प्रवक्ष्यामि देवि गुह्यं शुभानने

sthāne saṃśayitaṃ devi taddhi guhyatamaṃ nṛṣu |
tvatpriyārthaṃ pravakṣyāmi devi guhyaṃ śubhānane

224.10

पूर्वदेहकृतं कर्म भुञ्जते तदिह प्रजाः ।
इहैव यत्कृतं पुंसां तत्परत्र फलिष्यतै ।
एषा व्यवस्थितिर्देवि मानुषेष्वेव दृश्यते

pūrvadehakṛtaṃ karma bhuñjate tadiha prajāḥ |
ihaiva yatkṛtaṃ puṃsāṃ tatparatra phaliṣyatai |
eṣā vyavasthitirdevi mānuṣeṣveva dṛśyate

224.11

देवानामसुराणां च अमरत्वात्तपोबलात् ।
एकेनैव शरीरेण भुज्यते कर्मणां फलम् ।
मानुषैर्न तथा देवि अन्तरं त्वेतदिष्यते

devānāmasurāṇāṃ ca amaratvāttapobalāt |
ekenaiva śarīreṇa bhujyate karmaṇāṃ phalam |
mānuṣairna tathā devi antaraṃ tvetadiṣyate

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