अनुशासन पर्व

अध्याय 125: कपिला से जीविका चलानेवालों के नियम

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥

11 श्लोक · 125 में से 274

इस अध्याय में क्या होता है

कपिला से जीविका चलानेवालों के नियम

शुकदेव पूछते हैं कि क्षत्रिय, शूद्र और मन्त्रहीन ब्राह्मण कपिला गाय से जीविका कैसे चलाएँ। व्यास निर्णय देते हैं कि कपिला गायों में श्रेष्ठ है, उसे देनेवाला या विधि से सेवा करनेवाला स्वर्ग पाता है। पर जो कपिला को डण्डे या पैर से छूता है, वह उस स्पर्श मात्र से नरक जाता है। उसे मन्त्र से ही जोता और छोड़ा जाए, बिना मन्त्र जोतनेवाला कीड़े की योनि में जन्मता है। उसके मर्मस्थान पर चोट हो, तो वह जितने पग चले उतने जन्म मारनेवाला कीड़ा बनता है और उसके रक्त की हर बूँद के लिए हज़ार वर्ष नरक भोगता है। न्याय से उसका उपयोग करनेवाले ब्राह्मण निर्दोष लोकों में आनन्द पाते हैं।

शुक उवाच

125.1

क्षत्रियाश्चैव शूद्राश्च मन्त्रहीनाश्च ये द्विजाः ।
कपिलामुपजीवन्ति कथमेतत्पितर्भवेत्

kṣatriyāścaiva śūdrāśca mantrahīnāśca ye dvijāḥ |
kapilāmupajīvanti kathametatpitarbhavet

श्रीव्यास उवाच

125.2

क्षत्रियाश्चैव शूद्राश्च मन्त्रहीनाश्च ये द्विजाः ।
कपिलामुपजीवन्ति तेषां वक्ष्यामि निर्णयम्

kṣatriyāścaiva śūdrāśca mantrahīnāśca ye dvijāḥ |
kapilāmupajīvanti teṣāṃ vakṣyāmi nirṇayam

125.3

कपिलास्तूत्तमा लोके गोषु चैवोत्तमा मताः ।
तासां दाता लभेत्स्वर्गं विधिना यश्च सेवते

kapilāstūttamā loke goṣu caivottamā matāḥ |
tāsāṃ dātā labhetsvargaṃ vidhinā yaśca sevate

125.4

स्पृशेत कपिलां यस्तु दण्डेन चरणेन वा ।
स तेन स्पर्शमात्रेण नरकायोपपद्यते

spṛśeta kapilāṃ yastu daṇḍena caraṇena vā |
sa tena sparśamātreṇa narakāyopapadyate

125.5

मन्त्रेण युञ्ज्यात्कपिलां मन्त्रेणैव प्रमुञ्चते ।
मन्त्रिहीनं तु यो युञ्जात्कृमियोनौ प्रसूयते

mantreṇa yuñjyātkapilāṃ mantreṇaiva pramuñcate |
mantrihīnaṃ tu yo yuñjātkṛmiyonau prasūyate

125.6

प्रहाराहतमर्माङ्गा दुःखेन च जडीकृता ।
पदानि यावद्गच्छेत तावल्लोकान्कृमिर्भवेत्

prahārāhatamarmāṅgā duḥkhena ca jaḍīkṛtā |
padāni yāvadgaccheta tāvallokānkṛmirbhavet

125.7

यावन्तो बिन्दवस्तस्याः शोणितस्य क्षितिं गताः ।
तावद्वर्षसहस्राणि नरकं प्रतिपद्यते

yāvanto bindavastasyāḥ śoṇitasya kṣitiṃ gatāḥ |
tāvadvarṣasahasrāṇi narakaṃ pratipadyate

125.8

मन्त्रेण युञ्ज्यात्कपिलां मन्त्रेण विनियोजयेत् ।
मन्त्रहीनैरनुयुतो मञ्जयेत्तमसि प्रभो

mantreṇa yuñjyātkapilāṃ mantreṇa viniyojayet |
mantrahīnairanuyuto mañjayettamasi prabho

125.9

कपिलां येऽपि जीवन्ति बुद्धिमोहान्विता नराः ।
तेऽपि वर्षसहस्राणि पतन्ति नरके नृप

kapilāṃ ye'pi jīvanti buddhimohānvitā narāḥ |
te'pi varṣasahasrāṇi patanti narake nṛpa

125.10

अथ न्यायेन ये विप्राः कपिलामुपयुञ्जते ।
तस्मिंल्लोके प्रमोदन्ते लोकाश्चैषामनामयाः

atha nyāyena ye viprāḥ kapilāmupayuñjate |
tasmiṃlloke pramodante lokāścaiṣāmanāmayāḥ

125.11

विधिना ये न कुर्वन्ति शूद्रास्तानुपधारय

vidhinā ye na kurvanti śūdrāstānupadhāraya

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