01अपने शरीर का पुल
महाकपि जातक में बोधिसत्त गंगा तट के एक आम के पेड़ पर रहने वाले अस्सी हज़ार बंदरों के राजा हैं। बनारस का राजा धनुर्धारियों से पेड़ को घेर लेता है। वानरराज नदी के पार छलाँग लगाते हैं, अपने पैरों में एक लता बाँधते हैं, लौटकर छलाँग लगाते हैं और हाथों से इस पार की डाल पकड़ लेते हैं, ताकि उनका दल उनकी पीठ पर से पार हो जाए। एक ईर्ष्यालु बंदर उन पर ज़ोर से कूदता है और उनका हृदय फट जाता है। देख रहा मनुष्यों का राजा उन्हें धीरे से नीचे उतरवाता है और उनके अंतिम वचन सुनता है कि राजा को अपने आश्रितों की कैसे चिंता करनी चाहिए। लगभग 2,100 वर्ष पहले भरहुत में एक शिल्पी ने यह दृश्य वेदिका के एक पदक पर उकेरा।
02गाथा और गद्य
जातकों की केवल गाथाएँ खुद्दक निकाय में त्रिपिटक का अंग हैं। हर कथा को आगे बढ़ाने वाला गद्य जातकट्ठवण्णना से आता है, वह अट्ठकथा जो लगभग पाँचवीं शताब्दी ई. में लंका में लिखी गई। हर कथा का एक ढाँचा है: जेतवन में भिक्षुओं के बीच कुछ घटता है, बुद्ध बहुत पहले की एक कथा सुनाते हैं, और अंत में बताते हैं कि कौन कौन था। “उस समय वानरराज मैं था।” पूर्वजन्म की कथा को अतीतवत्थु, वर्तमान प्रसंग को पच्चुप्पन्नवत्थु, और अंत की पहचान को समोधान कहा जाता है।
03दीपंकर के चरणों में संकल्प
संग्रह निदानकथा से खुलता है, जिसमें बुद्ध का जीवन तीन खंडों में है। दूरे-निदान असंख्य युग पहले तपस्वी सुमेध से आरम्भ होता है, जो कीचड़ में लेट गए ताकि दीपंकर बुद्ध और उनके भिक्षु उन पर से सूखे पैर चल सकें, और जिन्होंने स्वयं बुद्ध बनने का संकल्प किया। दीपंकर ने भविष्यवाणी की कि ऐसा होगा। अविदूरे-निदान वेस्सन्तर के अंतिम जन्म और तुषित देवलोक के निवास से बोधगया में सम्बोधि तक चलता है। सन्तिके-निदान कथा को श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक द्वारा जेतवन के दान तक ले जाता है।
04547 जन्म, दस पारमिताएँ
547 जन्मों में बोधिसत्त राजा, व्यापारी, ब्राह्मण, चाण्डाल, खरगोश, हिरण, हाथी, वृक्ष-देवता बनते हैं, कभी ऐसा चोर भी जो आगे सुधरता है। इन सबमें एक सूत्र दस पारमिताओं का है, वे पूर्णताएँ जो बुद्ध को पूरी करनी होती हैं: दान, शील, नेक्खम्म, प्रज्ञा, वीर्य, क्षान्ति, सत्य, अधिष्ठान, मैत्री और उपेक्षा। अंतिम दस जातक, महानिपात, हर पारमिता को एक महान जन्म देते हैं, और थेरवाद बौद्ध उन्हें दस जातक के रूप में जानते हैं, जो प्रायः विहारों की दीवारों पर क्रम से चित्रित होते हैं।
05चन्द्रमा में खरगोश
शश जातक में बोधिसत्त एक वन में तीन मित्रों, बंदर, सियार और ऊदबिलाव, के साथ रहने वाले खरगोश हैं। एक उपोसथ के दिन वे दान देने का निश्चय करते हैं। ऊदबिलाव सात लाल मछलियाँ लाता है, सियार दो भुनी हुई गोह और दही का घड़ा, बंदर पके आम। खरगोश के पास केवल घास है। जब शक्र भूखे ब्राह्मण के रूप में आते हैं, खरगोश उनसे आग जलाने को कहता है और अपने शरीर से उनका पेट भरने के लिए उसमें कूद जाता है। आग उसे गर्म तक नहीं करती। शक्र चन्द्रमा पर खरगोश का आकार बना देते हैं ताकि यह दान पूरे कल्प तक याद रहे।
06पत्थर और भित्तियों पर
भरहुत के शिल्पियों ने अपने फलकों पर ब्राह्मी में जातक का नाम लिखा, और इसी से हम जानते हैं कि ई.पू. दूसरी शताब्दी में ये कथाएँ कही जाती थीं। साँची के उत्तरी तोरण के बड़ेरे पर वेस्सन्तर जातक है, राजकुमार अपना श्वेत हाथी, अपना रथ, अपनी संतान दान कर रहे हैं। अजंता में गुफा 1 के चित्रकारों ने महाजनक जातक को पूरी दीवार पर फैलाया, और गुफा 17 में दर्जन भर अन्य जातकों के साथ वेस्सन्तर फिर है। और पूर्व में जावा के बोरोबुदुर की दीर्घाओं में सैकड़ों जातक-फलक हैं।
07वेस्सन्तर, रात भर का पाठ
अंतिम और सबसे लंबा जातक राजकुमार वेस्सन्तर का है, जिन्होंने माँगी गई हर वस्तु दान कर दी, अपनी पत्नी और बच्चों तक को, और इस तरह दान-पारमिता पूरी की। थाईलैंड और लाओस में थेत महाचाट या बुन फावेत नाम के पर्व पर हर वर्ष इसके तेरह खंडों का पाठ होता है, प्रायः पूरे दिन और रात, और ग्रामवासी हर खंड के लिए भेंट लाते हैं। श्रीलंका में इसके दृश्य पुराने विहारों में चित्रित हैं और लोक-नाटक के रूप में खेले जाते हैं। श्रोता बच्चों के बिछड़ने पर रोते हैं, फिर परिवार के मिलन पर आनन्दित होते हैं।
08संस्करण और अनुवाद
विग्गो फॉसबोल ने 1877 से 1896 के बीच कोपेनहेगन और लंदन से अट्ठकथा सहित पाली जातक छह खंडों में सम्पादित किया। कैम्ब्रिज में ई. बी. कॉवेल के नेतृत्व में एक दल ने सभी 547 जातकों का अंग्रेज़ी अनुवाद किया (1895–1907)। हिंदी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित भदन्त आनन्द कौसल्यायन के छह खंडों के हिंदी अनुवाद ने इन्हें हिंदी पाठकों तक पहुँचाया। बहुत-सी जातक कथाओं का कथानक भारत के अन्य संग्रहों की कथाओं से मिलता है, और जिन बच्चों ने जातक शब्द कभी नहीं सुना, वे भी खरगोश, वानर-पुल और उस कछुए को जानते हैं जो अपना मुँह बंद नहीं रख सका।
इसमें क्या है
- 1निदानकथा निदानकथा
भूमिका: बुद्ध का जीवन तीन खंडों में, दूरे, अविदूरे और सन्तिके निदान। यह दीपंकर बुद्ध के सामने सुमेध के संकल्प से जेतवन के दान तक चलती है।
- 2एककनिपात (1–150) एककनिपात
150 कथाएँ, हर एक में एक गाथा, पंद्रह वग्गों में। यह अपण्णक जातक से खुलता है, जो संदिग्ध के स्थान पर निश्चित मार्ग चुनना सिखाता है, और इसमें बहुत-सी प्रसिद्ध पशु-कथाएँ हैं।
- 3दुकनिपात (151–250) दुकनिपात
दो-दो गाथाओं की 100 कथाएँ। यह राजोवाद जातक से खुलता है, जिसमें दो राजाओं के सारथी एक संकरे मार्ग पर मिलते हैं और बहस करते हैं कि किसका स्वामी श्रेष्ठ राजा है।
- 4तिक और चतुक्क निपात (251–350)
तीन गाथाओं की पचास और चार गाथाओं की पचास कथाएँ। चतुक्कनिपात में चन्द्रमा के खरगोश का शश जातक (316) है।
- 5पञ्चक से दसक निपात (351–454)
पाँच से दस गाथाओं की कथाएँ। सत्तकनिपात में महाकपि जातक (407) है, वह वानरराज जिसने अपने शरीर का पुल बनाया।
- 6एकादस से पकिण्णक निपात (455–496)
ग्यारह, बारह और तेरह गाथाओं की कथाएँ, और एक विविध निपात। अपनी अंधी माता की सेवा करने वाले हाथी का मातुपोसक जातक एकादसकनिपात को खोलता है।
- 7वीसति से असीति निपात (497–537)
बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ, सत्तर और अस्सी गाथाओं वाली लंबी कथाएँ। इनमें मातंग, कुस और महासुतसोम जातक हैं।
- 8महानिपात (538–546) महानिपात
दस महाजन्मों में से नौ: तेमिय, महाजनक, सुवण्णसाम, निमि, महोसध, भूरिदत्त, चन्दकुमार, नारद और विधुर। हर जन्म एक पारमिता पूर्ण करता है, जैसे तेमिय का नेक्खम्म और महाजनक का वीर्य।
- 9वेस्सन्तर जातक (547) वेस्सन्तरजातक
अंतिम और सबसे लंबा जातक, सिद्धार्थ से पहले बोधिसत्त का अंतिम मनुष्य जन्म। राजकुमार वेस्सन्तर दान-पारमिता पूर्ण करते हैं, और थेरवाद जगत में यह कथा तेरह खंडों में सुनाई जाती है।
प्रसिद्ध श्लोक
अपण्णकं ठानमेके, दुतियं आहु तक्किका; एतदञ्ञाय मेधावी, तं गण्हे यदपण्णकं॥
कुछ निश्चित स्थान की बात करते हैं, तर्क करने वाले दूसरे की। यह जानकर बुद्धिमान वही ग्रहण करे जो निश्चित है।Jataka 1 (Apannaka Jataka)
न ससस्स तिला अत्थि, न मुग्गा नपि तण्डुला; इमिना अग्गिना पक्कं, ममं भुत्वा वने वसा॥
खरगोश के पास न तिल है, न मूँग, न चावल। इस अग्नि में पके मुझे खाकर वन में रहो।Jataka 316 (Sasa Jataka), verse 4
एसा ते उपमा राज, तं सुणोहि अरिन्दम; रञ्ञा रट्ठस्स योग्गस्स, बलस्स निगमस्स च; सब्बेसं सुखमेट्ठब्बं, खत्तियेन पजानता॥
हे राजन्, यह तुम्हारे लिए उपमा है; हे शत्रुदमन, इसे सुनो। ज्ञानी क्षत्रिय राजा को सबके सुख की कामना करनी चाहिए: राष्ट्र की, वाहनों की, सेना की और नगरों की।Jataka 407 (Mahakapi Jataka), verse 7
आर्यशूर की संस्कृत जातकमाला (लगभग चौथी शताब्दी ई.) में फिर कही गईं और अजन्ता से पगान तक चित्रित हुईं; ई. बी. कॉवेल का अंग्रेज़ी अनुवाद (1895–1907) और भदन्त आनन्द कौसल्यायन का हिंदी अनुवाद सभी 547 कथाओं को आधुनिक पाठकों तक लाए।