आदाय शेषस्तस्यान्त्रं बलस्य केरलादिषु ।
चिक्षेप तत्र जायन्ते विद्रुमाः सुमहागुणाः
ādāya śeṣastasyāntraṃ balasya keralādiṣu |
cikṣepa tatra jāyante vidrumāḥ sumahāguṇāḥ
इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे विद्रुमपरीक्षणं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥
4 श्लोक · 80 में से 241
सूत कहते हैं कि शेष ने बल की आँतें लेकर केरल आदि प्रदेशों में डाल दीं, और वहाँ बड़े गुणों वाले मूँगे उत्पन्न होते हैं। श्रेष्ठ मूँगा खरगोश के रक्त जैसा लाल, या गुंजा और जवाकुसुम जैसा होता है। सुनीलक, देवक और रोमक वे स्थान कहे गए हैं जहाँ सुन्दर रंग का मूँगा निकलता है। अन्यत्र जन्मा मूँगा प्रथम श्रेणी का नहीं, और उसका मूल्य शिल्पी की कारीगरी पर निर्भर है। अच्छा मूँगा स्वच्छ, कोमल, चिकना और सुन्दर लाल होता है। यह धन और धान्य देता है और विष तथा पीड़ा का भय मिटाता है। अन्तिम श्लोक शौनक के लिए समेटता है कि पुलक, रुधिराक्ष, स्फटिक और विद्रुम की परीक्षा कह दी गई, और वज्र से आरम्भ हुआ रत्नवर्णन पूरा होता है।
सूत उवाच
आदाय शेषस्तस्यान्त्रं बलस्य केरलादिषु ।
चिक्षेप तत्र जायन्ते विद्रुमाः सुमहागुणाः
ādāya śeṣastasyāntraṃ balasya keralādiṣu |
cikṣepa tatra jāyante vidrumāḥ sumahāguṇāḥ
तत्र प्रधानं शशलोहिताभं गुञ्जाजवापुष्पनिभं प्रदिष्टम् ।
सुनीलकं देवकरोमकञ्च स्थानानि तेषु प्रभवं सुरागम्
tatra pradhānaṃ śaśalohitābhaṃ guñjājavāpuṣpanibhaṃ pradiṣṭam |
sunīlakaṃ devakaromakañca sthānāni teṣu prabhavaṃ surāgam
अन्यत्र जातं च न तत्प्रधानं मूल्यं भवेच्छिल्पिविशेषयोगात् ।
प्रसन्नं कोमलं स्निग्धं सुरागं विद्रुमं हि तत्
anyatra jātaṃ ca na tatpradhānaṃ mūlyaṃ bhavecchilpiviśeṣayogāt |
prasannaṃ komalaṃ snigdhaṃ surāgaṃ vidrumaṃ hi tat
धनधान्यकरं लोके विषार्त्तिभयनाशनम् ।
परीक्षा पुलकस्योक्ता रुधिराक्षस्य वै मणेः ।
स्फटिकस्य विद्रुमस्य रत्नज्ञानाय शौनक
dhanadhānyakaraṃ loke viṣārttibhayanāśanam |
parīkṣā pulakasyoktā rudhirākṣasya vai maṇeḥ |
sphaṭikasya vidrumasya ratnajñānāya śaunaka
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)