पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 79: स्फटिक की उत्पत्ति और लक्षण

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे स्फटिकपरीक्षणं नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥

3 श्लोक · 79 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

स्फटिक की उत्पत्ति और लक्षण

सूत कहते हैं कि हलधर बलराम ने दानव की मेदा को कावेर, विन्ध्य, यवन, चीन और नेपाल की भूमियों में यत्न से बिखेरा। उससे आकाश जैसा निर्मल स्फटिक उत्पन्न हुआ, और तैल नामक स्फटिक भी। यह कमलनाल या शंख जैसा श्वेत होता है, कभी हल्के दूसरे रंग की झलक लिए। रत्नों में इसके समान दूसरा नहीं, और यह पापों का नाश भी करता है। शिल्पी के तराशने और चमकाने पर इसे तुरन्त कुछ मूल्य मिल जाता है, यद्यपि बड़े रत्नों की भाँति शास्त्र इसका निश्चित मूल्य नहीं बताता। अध्याय तीन श्लोकों का है और इस प्रकरण में किसी पत्थर का सबसे छोटा वर्णन यही है।

सूत उवाच

79.1

कावेरविन्ध्ययवनचीननेपालभूमिषु ।
लाङ्गली व्यकिरन्मेदो दानवस्य प्रयत्नतः

kāveravindhyayavanacīnanepālabhūmiṣu |
lāṅgalī vyakiranmedo dānavasya prayatnataḥ

79.2

आकाशशुद्धं तैलाख्यमुत्पन्नं स्फटिकं ततः ।
मृणालशङ्खधवलं किञ्चिद्वर्णान्तरन्वितम्

ākāśaśuddhaṃ tailākhyamutpannaṃ sphaṭikaṃ tataḥ |
mṛṇālaśaṅkhadhavalaṃ kiñcidvarṇāntaranvitam

79.3

न त्तुल्यं हि रत्नानामथवा पापनाशनम् ।
संस्कृतं शिल्पिना सद्यो मूल्यं किञ्चिल्लभेत्ततः

na ttulyaṃ hi ratnānāmathavā pāpanāśanam |
saṃskṛtaṃ śilpinā sadyo mūlyaṃ kiñcillabhettataḥ

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