हुतभुग्रूपमादाय दानवस्य यथेप्सितम् ।
नर्मदायां निचिक्षेप किञ्चिद्धीनादिभूमिषु
hutabhugrūpamādāya dānavasya yathepsitam |
narmadāyāṃ nicikṣepa kiñciddhīnādibhūmiṣu
इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे रुधिराक्षरत्नपरीक्षणं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥
3 श्लोक · 78 में से 241
सूत कहते हैं कि अग्नि ने दानव का रूप इच्छानुसार लेकर नर्मदा में और कुछ निचली भूमियों में डाल दिया। वहाँ रुधिराक्ष रत्न उत्पन्न होता है। यह लाल इन्द्रगोप कीट जैसी चित्तियों वाला और तोते की चोंच जैसे रंग का होता है, भरा हुआ और समान आकार का, अनेक रूपों में मिलता है, और निकालने पर इसकी सब जातियाँ समान मूल्य की मानी जाती हैं। श्रेष्ठ वह है जिसका मध्य चन्द्रमा जैसा पाण्डुर और रंग अत्यन्त शुद्ध हो, और परत भार और मूल्य में इन्द्रनील जैसी। शास्त्र कहता है कि ऐसा रत्न स्वामी को ऐश्वर्य और अनेक सेवक देता है। पूरा पकने पर इसका रंग इन्द्र के वज्र जैसा हो जाता है। अध्याय तीन श्लोकों का है और मूल्य नहीं बताता।
सूत उवाच
हुतभुग्रूपमादाय दानवस्य यथेप्सितम् ।
नर्मदायां निचिक्षेप किञ्चिद्धीनादिभूमिषु
hutabhugrūpamādāya dānavasya yathepsitam |
narmadāyāṃ nicikṣepa kiñciddhīnādibhūmiṣu
तत्रेन्द्रगोपकलितं शुकवक्रवर्णं संस्थानतः प्रकटपीनसमानमात्रम् ।
नानाप्रकारविहितं रुधिराक्ष
रत्नमुद्धृत्य तस्य खलु सर्वसमानमेव
tatrendragopakalitaṃ śukavakravarṇaṃ saṃsthānataḥ prakaṭapīnasamānamātram |
nānāprakāravihitaṃ rudhirākṣa
ratnamuddhṛtya tasya khalu sarvasamānameva
मध्येन्दुपाण्डुरमतीव विशुद्धवर्णं तच्चेन्द्रनीलसदृशं पटलं तुले स्यात् ।
सैश्वर्य्यभृत्यजननं कथितं तदैव पक्वञ्च तत्किल भवेत्सुरवज्रवर्णम्
madhyendupāṇḍuramatīva viśuddhavarṇaṃ taccendranīlasadṛśaṃ paṭalaṃ tule syāt |
saiśvaryyabhṛtyajananaṃ kathitaṃ tadaiva pakvañca tatkila bhavetsuravajravarṇam
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