पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 77: पुलक मणि: उत्पत्ति, लक्षण और मूल्य

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे पुलकपरीक्षणं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥

4 श्लोक · 77 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

पुलक मणि: उत्पत्ति, लक्षण और मूल्य

सूत कहते हैं कि दानवराज के नख पवित्र पर्वतों, नदियों और उत्तर के प्रदेशों में रखे गए, और वे स्थान प्रसिद्ध हुए। दशार्ण, वागदर, मेकल, कालग आदि में उत्तम पुलक मणियाँ मिलती हैं, जिनके रंग गुंजा, अंजन, मधु और कमलनाल जैसे होते हैं, और कुछ अग्नि या केले जैसी आभा देती हैं। शंख, कमल, भौंरे या सूर्य के चिह्नों वाली या महीन सूत्र जैसी रेखाओं वाली पुलक परम पवित्र और मंगलमय है और वृद्धि देती है। पर जिन पर कौए, कुत्ते, गधे, सियार, भेड़िये या मांस और रक्त से भीगे मुख वाले गिद्धों की आकृति हो, वे मृत्यु देती हैं और विद्वान उन्हें त्याग दे। उत्तम पुलक के एक पल का मूल्य पाँच सौ कहा गया है। पूरा उपदेश चार श्लोकों में है।

सूत उवाच

77.1

पुण्येषु पर्वतवरेषु च निम्नगासु स्थानान्तरेषु च तथोत्तरदेशगत्वात् ।
संस्थापिताः स्वनखबाहुगतेः प्रकाशं संपूज्य दानवपतिं प्रथिते प्रदेशे

puṇyeṣu parvatavareṣu ca nimnagāsu sthānāntareṣu ca tathottaradeśagatvāt |
saṃsthāpitāḥ svanakhabāhugateḥ prakāśaṃ saṃpūjya dānavapatiṃ prathite pradeśe

77.2

दाशार्णवागदर
मेकलकालगादौ गुञ्जाञ्जनक्षौद्रमृणालवर्णाः ।
गन्धर्ववह्निकदलीसदृशावभासा एते प्रशस्ताः पुलकाः प्रसूताः

dāśārṇavāgadara
mekalakālagādau guñjāñjanakṣaudramṛṇālavarṇāḥ |
gandharvavahnikadalīsadṛśāvabhāsā ete praśastāḥ pulakāḥ prasūtāḥ

77.3

शङ्खाब्जभृङ्गार्कविचित्रभङ्गा सूत्रैरु
पेताः परमाः पवित्राः ।
मङ्गल्ययुक्ता बहुभक्तिचित्रा वृद्धिप्रदास्ते पुलका भवन्ति

śaṅkhābjabhṛṅgārkavicitrabhaṅgā sūtrairu
petāḥ paramāḥ pavitrāḥ |
maṅgalyayuktā bahubhakticitrā vṛddhipradāste pulakā bhavanti

77.4

काका
श्वरासभसृगालवृकोग्ररूपैर्गृध्रैः समांसरुधिरार्द्रमुखैरुपेताः ।
मृत्युप्रदाश्च विदुषा परिवर्जनीया मूल्यं पलस्य कथितं च शतानि पञ्च

kākā
śvarāsabhasṛgālavṛkograrūpairgṛdhraiḥ samāṃsarudhirārdramukhairupetāḥ |
mṛtyupradāśca viduṣā parivarjanīyā mūlyaṃ palasya kathitaṃ ca śatāni pañca

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