इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे पुलकपरीक्षणं नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥
4 श्लोक · 77 में से 241
इस अध्याय में क्या होता है
पुलक मणि: उत्पत्ति, लक्षण और मूल्य
सूत कहते हैं कि दानवराज के नख पवित्र पर्वतों, नदियों और उत्तर के प्रदेशों में रखे गए, और वे स्थान प्रसिद्ध हुए। दशार्ण, वागदर, मेकल, कालग आदि में उत्तम पुलक मणियाँ मिलती हैं, जिनके रंग गुंजा, अंजन, मधु और कमलनाल जैसे होते हैं, और कुछ अग्नि या केले जैसी आभा देती हैं। शंख, कमल, भौंरे या सूर्य के चिह्नों वाली या महीन सूत्र जैसी रेखाओं वाली पुलक परम पवित्र और मंगलमय है और वृद्धि देती है। पर जिन पर कौए, कुत्ते, गधे, सियार, भेड़िये या मांस और रक्त से भीगे मुख वाले गिद्धों की आकृति हो, वे मृत्यु देती हैं और विद्वान उन्हें त्याग दे। उत्तम पुलक के एक पल का मूल्य पाँच सौ कहा गया है। पूरा उपदेश चार श्लोकों में है।