पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 210: अर्धसम वृत्तों के लक्षण

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डेर्ऽद्धसमवृत्तलक्षणादिनिरूपणं नाम दशोत्तरद्विशततमोऽध्यायः ॥

7 श्लोक · 210 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

अर्धसम वृत्तों के लक्षण

सूत अर्धसम वृत्तों के लक्षण बताते हैं, जिनमें पहले और तीसरे पाद का एक रूप होता है और दूसरे तथा चौथे का दूसरा। उपचित्रक के विषम पादों में तीन सगण, फिर लघु और गुरु होते हैं, और सम पादों में भगण और अन्त में दो गुरु। द्रुतमध्या, वेगवती, भद्रविराट् और केतुमती के दोनों रूप इसी संक्षिप्त गण-संकेत में दिए गए हैं। आख्यानकी के विषम पादों में तगण, तगण, जगण और दो गुरु, तथा सम पादों में जगण, तगण, जगण और दो गुरु होते हैं; विपरीताख्यानकी में क्रम उलट जाता है, जैसा पिङ्गल ने कहा। पुष्पिताग्रा नगण, नगण, रगण, यगण को नगण, जगण, जगण, रगण और गुरु से जोड़ती है। अपरवक्त्र, औपच्छन्दसिक और वाङ्मती से यह छोटा अध्याय पूरा होता है।

सूत उवाच

210.1

सससलगाश्च विषमे पादे यद्युपचित्रकम् ।
समे भौ भगगाः स्युश्च द्रुतमध्या भभौ भगौ

sasasalagāśca viṣame pāde yadyupacitrakam |
same bhau bhagagāḥ syuśca drutamadhyā bhabhau bhagau

210.2

गः पादे विषमेऽन्यत्र नजौ ज्यौ च गणौ स्मृतौ

gaḥ pāde viṣame'nyatra najau jyau ca gaṇau smṛtau

210.3

विषमे वेगवती सा गः समे भौ भो गगौ गणाः ।
पादेऽसमे तजौ रो गः समे मसौ जगौ गरुः ।
भवेद्भद्रविराट्केतुमती तु विषमे सजौ

viṣame vegavatī sā gaḥ same bhau bho gagau gaṇāḥ |
pāde'same tajau ro gaḥ same masau jagau garuḥ |
bhavedbhadravirāṭketumatī tu viṣame sajau

210.4

सगौ समे भ्रौ नगगा आख्यानकी त्वथासमे ।
तौ जो गगौ समे पादे जतजा गुरुकद्वयम्

sagau same bhrau nagagā ākhyānakī tvathāsame |
tau jo gagau same pāde jatajā gurukadvayam

210.5

विपरीताख्यानकं स्याद्विषमे जस्तजौ गगौ ।
ततौ जगौ समे गः स्यात्पिङ्गलेन ह्युदाहृतम्

viparītākhyānakaṃ syādviṣame jastajau gagau |
tatau jagau same gaḥ syātpiṅgalena hyudāhṛtam

210.6

पादेऽथ विषमे चैव पुष्पिताग्रा ननौ रयौ ।
समे नजौ जरौ गश्च वैतालीयं वदन्ति हि ।
वृत्तञ्चापरवक्त्राख्यमौपच्छन्दसिकं परम्

pāde'tha viṣame caiva puṣpitāgrā nanau rayau |
same najau jarau gaśca vaitālīyaṃ vadanti hi |
vṛttañcāparavaktrākhyamaupacchandasikaṃ param

210.7

वाङ्मती रजरा यः स्यादयुग्मे जरजा रगौ

vāṅmatī rajarā yaḥ syādayugme jarajā ragau

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