पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 203: गाय, भैंस और घोड़ों के उपचार

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे नानौषधप्रयोगनिरूपणं नाम त्र्युत्तरद्विशततमोऽध्यायः ॥

8 श्लोक · 203 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

गाय, भैंस और घोड़ों के उपचार

हरि भगवान शिव को पशुओं के छोटे उपचार बताते हैं। जो गाय अपने ही बछड़े से द्वेष करे, उसे नमक मिलाकर उसी का दूध पिलाया जाए तो बछड़ा उसे फिर प्रिय हो जाता है। भैंस या गाय के गले में कुत्ते की हड्डी बाँधने से कीड़े गिर जाते हैं, ऐसा कहा गया है। हाथ से मथा वरुण-फल का रस चौपायों और दोपायों दोनों के कीड़े नष्ट करता है। जया भरने से घाव भर जाता है। हाथी का मूत्र पिलाने से गाय-भैंसों का संक्रामक रोग दूर होता है। छाछ में घिसे मसूर और शालि के बीज गाय के दूध के लिए हितकर हैं। नमक के साथ शरपुंखा का पत्ता घोड़ों के फफोले मिटाता है, और घृतकुमारी का पत्ता उनकी अयाल की खुजली।

हरिरुवाच

203.1

या गौर्द्वेष्टिं स्वकं वत्सं तस्या देयं स्वकं पयः ।
लवणेन समायुक्तं तस्या वत्सः प्रियो भवेत्

yā gaurdveṣṭiṃ svakaṃ vatsaṃ tasyā deyaṃ svakaṃ payaḥ |
lavaṇena samāyuktaṃ tasyā vatsaḥ priyo bhavet

203.2

शुनोऽस्थि कण्ठबद्धं हि महिषाणां गवा तथा ।
कृमिजालं पातयति सकलं नात्र संशयः

śuno'sthi kaṇṭhabaddhaṃ hi mahiṣāṇāṃ gavā tathā |
kṛmijālaṃ pātayati sakalaṃ nātra saṃśayaḥ

203.3

गोजङ्गनाभिपातः स्याद्गुञ्जामूलस्य भक्षणात्

gojaṅganābhipātaḥ syādguñjāmūlasya bhakṣaṇāt

203.4

वरुणफलस्यरसं करेण मथितं शिव ।
चतुष्पादद्विपदयोः कृमिजालं निपातयेत्

varuṇaphalasyarasaṃ kareṇa mathitaṃ śiva |
catuṣpādadvipadayoḥ kṛmijālaṃ nipātayet

203.5

व्रणञ्च शमयेद्रुद्र जयायाः पूरणात्तथा ।
गजमूत्रस्य वै पानं गोमहिष्युपसर्गनुत्

vraṇañca śamayedrudra jayāyāḥ pūraṇāttathā |
gajamūtrasya vai pānaṃ gomahiṣyupasarganut

203.6

समसूर शालिबीजं पीतं तक्रेण घर्षितम् ।
क्षीरे गोमहीषस्यैव गोः पुंसश्च हितं भवेत्

samasūra śālibījaṃ pītaṃ takreṇa gharṣitam |
kṣīre gomahīṣasyaiva goḥ puṃsaśca hitaṃ bhavet

203.7

पत्रञ्च शरपुङ्खाया दत्तं सलवणं शिव ।
वारिस्फोटं हयानाञ्च केसराणां विनाशयेत्

patrañca śarapuṅkhāyā dattaṃ salavaṇaṃ śiva |
vārisphoṭaṃ hayānāñca kesarāṇāṃ vināśayet

203.8

घृतकुमारीपत्रमेव दत्तं सलक्षणं हर ।
तुरगमकेसराणां कण्डूनंश्येन्न संशयः

ghṛtakumārīpatrameva dattaṃ salakṣaṇaṃ hara |
turagamakesarāṇāṃ kaṇḍūnaṃśyenna saṃśayaḥ

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