उत्तम चरित्र

अध्याय 8: मातृगण और रक्तबीज का वध

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये रक्तबीजवधोनामाष्टाशीतितमोऽध्यायः

61 श्लोक · 8 में से 9

इस अध्याय में क्या होता है

मातृगण और रक्तबीज का वध

शुम्भ असुरों के सब कुल भेजता है। उनके सामने देवताओं की शक्तियाँ उनके शरीरों से निकलती हैं: हंस-विमान पर ब्राह्मी, वृषभ पर माहेश्वरी, मयूर पर कौमारी, गरुड़ पर वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, और हाथी पर ऐन्द्री। स्वयं चण्डिका से एक उग्र शक्ति प्रकट होती हैं, जो शिव को असुरों के पास दूत बनाकर भेजती हैं, इसलिए शिवदूती कहलाती हैं। मातृगण सेना को खदेड़ देते हैं। तब रक्तबीज लड़ता है: उसके रक्त की जो बूँद धरती पर गिरती है, उससे उसी जैसा एक नया असुर उत्पन्न होता है, और जगत् रक्तबीजों से भर जाता है। चण्डिका काली से कहती हैं कि मुख फैलाकर हर बूँद पी जाओ। काली रक्त पीकर नए असुरों को खा जाती हैं, और रक्तहीन रक्तबीज गिर पड़ता है। मातृगण विजय से नाचते हैं।

ऋषिरुवाच

8.1

चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते ।
बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः

caṇḍe ca nihate daitye muṇḍe ca vinipātite |
bahuleṣu ca sainyeṣu kṣayiteṣvasureśvaraḥ

ऋषि बोले: जब दैत्य चण्ड मारा गया, मुण्ड धराशायी हुआ और बहुत-सी सेनाएँ नष्ट हो गईं, तब असुरों का स्वामी...

8.2

ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान् ।
उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह

tataḥ kopaparādhīnacetāḥ śumbhaḥ pratāpavān |
udyogaṃ sarvasainyānāṃ daityānāmādideśa ha

...प्रतापी शुम्भ, जिसका चित्त क्रोध के वश में हो गया था, सब दैत्य-सेनाओं को युद्ध के लिए तैयार होने की आज्ञा देने लगा।

8.3

अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः ।
कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः

adya sarvabalairdaityāḥ ṣaḍaśītirudāyudhāḥ |
kambūnāṃ caturaśītirniryāntu svabalairvṛtāḥ

आज छियासी उदायुध दैत्य अपनी पूरी सेना के साथ, और कम्बु कुल के चौरासी असुर अपनी-अपनी सेना से घिरे हुए निकल पड़ें।

8.4

कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै ।
शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया

koṭivīryāṇi pañcāśadasurāṇāṃ kulāni vai |
śataṃ kulāni dhaumrāṇāṃ nirgacchantu mamājñayā

मेरी आज्ञा से कोटिवीर्य नाम के असुरों के पचास कुल और धौम्रों के सौ कुल युद्ध के लिए निकलें।

8.5

कालका दौर्हृदा मौर्याः कालकेयास्तथासुराः ।
युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम

kālakā daurhṛdā mauryāḥ kālakeyāstathāsurāḥ |
yuddhāya sajjā niryāntu ājñayā tvaritā mama

कालक, दौर्हृद, मौर्य और कालकेय असुर युद्ध के लिए सजकर मेरी आज्ञा से शीघ्र निकल पड़ें।

8.6

इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः ।
निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः

ityājñāpyāsurapatiḥ śumbho bhairavaśāsanaḥ |
nirjagāma mahāsainyasahasrairbahubhirvṛtaḥ

यह आज्ञा देकर भयंकर शासन वाला असुरराज शुम्भ अनेक हज़ार बड़ी सेनाओं से घिरकर निकल पड़ा।

8.7

आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम् ।
ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम्

āyāntaṃ caṇḍikā dṛṣṭvā tatsainyamatibhīṣaṇam |
jyāsvanaiḥ pūrayāmāsa dharaṇīgaganāntaram

उस अत्यन्त भयानक सेना को आते देखकर चण्डिका ने अपने धनुष की टंकार से धरती और आकाश के बीच का सारा अन्तराल भर दिया।

8.8

स च सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप ।
घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका चाप्यबृंहयत्

sa ca siṃho mahānādamatīva kṛtavān nṛpa |
ghaṇṭāsvanena tannādamambikā cāpyabṛṃhayat

हे राजन, उनके सिंह ने भी बहुत भारी गर्जना की, और अम्बिका ने अपने घण्टे की ध्वनि से उस नाद को और बढ़ा दिया।

8.9

धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा ।
निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना

dhanurjyāsiṃhaghaṇṭānāṃ nādāpūritadiṅmukhā |
ninādairbhīṣaṇaiḥ kālī jigye vistāritānanā

धनुष की डोरी, सिंह और घण्टे के नाद से दिशाएँ भरी थीं, पर मुख फैलाए काली ने अपनी भयंकर गर्जनाओं से उन सबको भी दबा दिया।

8.10

तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम् ।
देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः

taṃ ninādamupaśrutya daityasainyaiścaturdiśam |
devī siṃhastathā kālī saroṣaiḥ parivāritāḥ

वह नाद सुनकर क्रोधित दैत्य-सेनाओं ने चारों ओर से देवी, सिंह और काली को घेर लिया।

8.11

एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम् ।
भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः

etasminnantare bhūpa vināśāya suradviṣām |
bhavāyāmarasiṃhānāmativīryabalānvitāḥ

हे राजन, इसी बीच देवशत्रुओं के विनाश और श्रेष्ठ देवताओं के कल्याण के लिए, अत्यन्त पराक्रम और बल से युक्त...

8.12

ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः ।
शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः

brahmeśaguhaviṣṇūnāṃ tathendrasya ca śaktayaḥ |
śarīrebhyo viniṣkramya tadrūpaiścaṇḍikāṃ yayuḥ

...ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु और इन्द्र की शक्तियाँ उनके शरीरों से निकलकर उन्हीं के रूप धारण किए चण्डिका के पास पहुँचीं।

8.13

यस्य देवस्य यद्रूपं यथाभूषणवाहनम् ।
तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ

yasya devasya yadrūpaṃ yathābhūṣaṇavāhanam |
tadvadeva hi tacchaktirasurān yoddhumāyayau

जिस देवता का जैसा रूप, जैसे आभूषण और जैसा वाहन था, ठीक वैसे ही रूप में उसकी शक्ति असुरों से युद्ध करने आई।

8.14

हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः ।
आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते

haṃsayuktavimānāgre sākṣasūtrakamaṇḍaluḥ |
āyātā brahmaṇaḥ śaktirbrahmāṇī sābhidhīyate

हंसों से जुते विमान पर, अक्षमाला और कमण्डलु लिए ब्रह्मा की शक्ति आईं; वे ब्रह्माणी कहलाती हैं।

8.15

माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी ।
महाहिवलया प्राप्ता चन्द्रलेखाविभूषणा

māheśvarī vṛṣārūḍhā triśūlavaradhāriṇī |
mahāhivalayā prāptā candralekhāvibhūṣaṇā

माहेश्वरी बैल पर सवार होकर आईं; उनके हाथ में उत्तम त्रिशूल था, बड़े-बड़े सर्प कंगन बने थे और चन्द्रकला उनका आभूषण थी।

8.16

कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना ।
योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी

kaumārī śaktihastā ca mayūravaravāhanā |
yoddhumabhyāyayau daityānambikā guharūpiṇī

कार्तिकेय का रूप धारण किए, हाथ में शक्ति लिए, श्रेष्ठ मोर पर सवार कौमारी दैत्यों से लड़ने आईं।

8.17

तथैव वैष्णावी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता ।
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ

tathaiva vaiṣṇāvī śaktirgaruḍopari saṃsthitā |
śaṅkhacakragadāśārṅgakhaḍgahastābhyupāyayau

इसी प्रकार गरुड़ पर बैठी वैष्णवी शक्ति शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और खड्ग हाथों में लिए आईं।

8.18

जज्ञे वाराहमतुलं रूपं या बिभ्रती हरेः ।
शक्तिः साप्यायौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम्

jajñe vārāhamatulaṃ rūpaṃ yā bibhratī hareḥ |
śaktiḥ sāpyāyau tatra vārāhīṃ bibhratī tanum

श्रीहरि के अनुपम वराह रूप को धारण करने वाली शक्ति भी वाराही का शरीर धरकर वहाँ आईं।

8.19

नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः ।
प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः

nārasiṃhī nṛsiṃhasya bibhratī sadṛśaṃ vapuḥ |
prāptā tatra saṭākṣepakṣiptanakṣatrasaṃhatiḥ

नृसिंह के समान शरीर धारण किए नारसिंही वहाँ आईं, जिनकी अयाल के झटकों से नक्षत्रमण्डल बिखर रहे थे।

8.20

वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरि स्थिता ।
प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा

vajrahastā tathaivaindrī gajarājopari sthitā |
prāptā sahasranayanā yathā śakrastathaiva sā

इसी प्रकार हाथ में वज्र लिए, गजराज ऐरावत पर बैठी ऐन्द्री आईं; वे इन्द्र के समान ही सहस्र नेत्रों वाली थीं।

8.21

ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः ।
हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याऽह चण्डिकाम्

tataḥ parivṛtastābhirīśāno devaśaktibhiḥ |
hanyantāmasurāḥ śīghraṃ mama prītyā'ha caṇḍikām

तब इन देवशक्तियों से घिरे भगवान शिव ने चण्डिका से कहा: मेरी प्रसन्नता के लिए असुरों का शीघ्र वध करो।

8.22

ततो देवोशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा ।
चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी

tato devośarīrāttu viniṣkrāntātibhīṣaṇā |
caṇḍikāśaktiratyugrā śivāśataninādinī

तब देवी के शरीर से अत्यन्त भीषण और उग्र चण्डिका-शक्ति प्रकट हुईं, जो सैकड़ों सियारिनों की तरह नाद कर रही थीं।

8.23

सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता ।
दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः

sā cāha dhūmrajaṭilamīśānamaparājitā |
dūta tvaṃ gaccha bhagavan pārśvaṃ śumbhaniśumbhayoḥ

उन अपराजिता ने धूम्रवर्ण जटाओं वाले भगवान शिव से कहा: भगवन्, आप दूत बनकर शुम्भ और निशुम्भ के पास जाइए।

8.24

ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ ।
ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः

brūhi śumbhaṃ niśumbhaṃ ca dānavāvatigarvitau |
ye cānye dānavāstatra yuddhāya samupasthitāḥ

अत्यन्त घमण्डी दानव शुम्भ और निशुम्भ से, और वहाँ युद्ध के लिए इकट्ठे हुए अन्य दानवों से कहिए।

8.25

त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः ।
यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ

trailokyamindro labhatāṃ devāḥ santu havirbhujaḥ |
yūyaṃ prayāta pātālaṃ yadi jīvitumicchatha

इन्द्र को त्रिलोकी फिर मिल जाए और देवता यज्ञ का हविर्भाग पाएँ। यदि जीना चाहते हो तो पाताल चले जाओ।

8.26

बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः ।
तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः

balāvalepādatha cedbhavanto yuddhakāṅkṣiṇaḥ |
tadāgacchata tṛpyantu macchivāḥ piśitena vaḥ

पर यदि बल के घमण्ड में युद्ध की इच्छा रखते हो, तो आओ, मेरी सियारिनें तुम्हारे मांस से तृप्त हों।

8.27

यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः स्वयम् ।
शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता

yato niyukto dautyena tayā devyā śivaḥ svayam |
śivadūtīti loke'smiṃstataḥ sā khyātimāgatā

क्योंकि उस देवी ने स्वयं भगवान शिव को दूत बनाकर भेजा, इसलिए वे संसार में शिवदूती नाम से प्रसिद्ध हुईं।

8.28

तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः ।
अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र कात्यायनी स्थिता

te'pi śrutvā vaco devyāḥ śarvākhyātaṃ mahāsurāḥ |
amarṣāpūritā jagmuryatra kātyāyanī sthitā

भगवान शिव के मुख से देवी के वचन सुनकर वे महादैत्य क्रोध से भरकर वहाँ गए जहाँ कात्यायनी विराजमान थीं।

8.29

ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः ।
ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः

tataḥ prathamamevāgre śaraśaktyṛṣṭivṛṣṭibhiḥ |
vavarṣuruddhatāmarṣāstāṃ devīmamarārayaḥ

तब सबसे पहले ही उग्र क्रोध से भरे देवशत्रुओं ने देवी पर बाणों, शक्तियों और ऋष्टियों की वर्षा की।

8.30

सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान् ।
चिच्छेद लीलयाऽध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः

sā ca tān prahitān bāṇāñchūlaśaktiparaśvadhān |
ciccheda līlayā'dhmātadhanurmuktairmaheṣubhiḥ

देवी ने खींचे हुए धनुष से छोड़े गए बड़े-बड़े बाणों द्वारा उनके फेंके बाण, त्रिशूल, शक्तियाँ और फरसे खेल-खेल में काट डाले।

8.31

तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान् ।
खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन् कुर्वती व्यचरत्तदा

tasyāgratastathā kālī śūlapātavidāritān |
khaṭvāṅgapothitāṃścārīn kurvatī vyacarattadā

उनके आगे काली विचरती हुई शत्रुओं को त्रिशूल के प्रहार से फाड़ रही थीं और खट्वांग से कुचल रही थीं।

8.32

कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः ।
ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति

kamaṇḍalujalākṣepahatavīryān hataujasaḥ |
brahmāṇī cākarocchatrūn yena yena sma dhāvati

ब्रह्माणी जहाँ-जहाँ दौड़तीं, वहाँ-वहाँ कमण्डलु का जल छिड़ककर शत्रुओं का पराक्रम और तेज हर लेतीं।

8.33

माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी ।
दैत्याञ्जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपना

māheśvarī triśūlena tathā cakreṇa vaiṣṇavī |
daityāñjaghāna kaumārī tathā śaktyātikopanā

माहेश्वरी ने त्रिशूल से, वैष्णवी ने चक्र से और अत्यन्त क्रोधित कौमारी ने शक्ति से दैत्यों का वध किया।

8.34

ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः ।
पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः

aindrīkuliśapātena śataśo daityadānavāḥ |
peturvidāritāḥ pṛthvyāṃ rudhiraughapravarṣiṇaḥ

ऐन्द्री के वज्र-प्रहार से फटे हुए सैकड़ों दैत्य और दानव रक्त की धाराएँ बहाते हुए धरती पर गिर पड़े।

8.35

तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः ।
वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः

tuṇḍaprahāravidhvastā daṃṣṭrāgrakṣatavakṣasaḥ |
vārāhamūrtyā nyapataṃścakreṇa ca vidāritāḥ

वाराही के थूथन के प्रहार से चूर, उनकी दाढ़ों की नोक से छाती फटे और चक्र से विदीर्ण हुए असुर धराशायी हो गए।

8.36

नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान् ।
नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगन्तरा

nakhairvidāritāṃścānyān bhakṣayantī mahāsurān |
nārasiṃhī cacārājau nādāpūrṇadigantarā

नारसिंही नखों से फाड़े हुए अन्य महादैत्यों को खाती हुई रणभूमि में विचरने लगीं; उनके नाद से दिशाओं का अन्तराल भर गया।

8.37

चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः ।
पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा

caṇḍāṭṭahāsairasurāḥ śivadūtyabhidūṣitāḥ |
petuḥ pṛthivyāṃ patitāṃstāṃścakhādātha sā tadā

शिवदूती के प्रचण्ड अट्टहास से त्रस्त असुर धरती पर गिर पड़े, और गिरे हुए उन असुरों को वे खा गईं।

8.38

इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान् ।
दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः

iti mātṛgaṇaṃ kruddhaṃ mardayantaṃ mahāsurān |
dṛṣṭvābhyupāyairvividhairneśurdevārisainikāḥ

क्रोधित मातृगण को अनेक प्रकार से महादैत्यों का मर्दन करते देखकर देवशत्रुओं के सैनिक भाग खड़े हुए।

8.39

पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान् ।
योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः

palāyanaparān dṛṣṭvā daityān mātṛgaṇārditān |
yoddhumabhyāyayau kruddho raktabījo mahāsuraḥ

मातृगण से पीड़ित दैत्यों को भागते देखकर महादैत्य रक्तबीज क्रोध में भरकर युद्ध करने आगे आया।

8.40

रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः ।
समुत्पतति मेदिन्यां तत्प्रमाणो महासुरः

raktabinduryadā bhūmau patatyasya śarīrataḥ |
samutpatati medinyāṃ tatpramāṇo mahāsuraḥ

जब भी उसके शरीर से रक्त की एक बूँद धरती पर गिरती, उसी के बराबर एक महादैत्य धरती से उठ खड़ा होता।

8.41

युयुधे स गदापाणिपरिन्द्रशक्त्या महासुरः ।
ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत्

yuyudhe sa gadāpāṇiparindraśaktyā mahāsuraḥ |
tataścaindrī svavajreṇa raktabījamatāḍayat

वह महादैत्य हाथ में गदा लिए इन्द्र की शक्ति से लड़ने लगा। तब ऐन्द्री ने अपने वज्र से रक्तबीज पर प्रहार किया।

8.42

कुलिशेनाहतस्याशु बहु सुस्राव शोणितम् ।
समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः

kuliśenāhatasyāśu bahu susrāva śoṇitam |
samuttasthustato yodhāstadrūpāstatparākramāḥ

वज्र लगते ही उसके शरीर से बहुत-सा रक्त बहने लगा, और उससे उसी के रूप और पराक्रम वाले योद्धा उठ खड़े हुए।

8.43

यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः ।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः

yāvantaḥ patitāstasya śarīrādraktabindavaḥ |
tāvantaḥ puruṣā jātāstadvīryabalavikramāḥ

उसके शरीर से जितनी रक्त की बूँदें गिरीं, उतने ही पुरुष उत्पन्न हो गए, जो उसी के समान वीर्य, बल और पराक्रम वाले थे।

8.44

ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः ।
समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम्

te cāpi yuyudhustatra puruṣā raktasambhavāḥ |
samaṃ mātṛbhiratyugraśastrapātātibhīṣaṇam

रक्त से जन्मे वे पुरुष भी वहाँ मातृकाओं से लड़ने लगे; अत्यन्त उग्र शस्त्रों के प्रहार से वह युद्ध बड़ा भयानक हो गया।

8.45

पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा ।
ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः

punaśca vajrapātena kṣatamasya śiro yadā |
vavāha raktaṃ puruṣāstato jātāḥ sahasraśaḥ

जब फिर वज्र के प्रहार से उसका सिर घायल हुआ, तो रक्त बह चला और उससे हज़ारों पुरुष उत्पन्न हो गए।

8.46

वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह ।
गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम्

vaiṣṇavī samare cainaṃ cakreṇābhijaghāna ha |
gadayā tāḍayāmāsa aindrī tamasureśvaram

वैष्णवी ने युद्ध में उस पर चक्र से प्रहार किया, और ऐन्द्री ने उस असुरराज को गदा से पीटा।

8.47

वैष्णावीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः ।
सहस्रशौ जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः

vaiṣṇāvīcakrabhinnasya rudhirasrāvasambhavaiḥ |
sahasraśau jagadvyāptaṃ tatpramāṇairmahāsuraiḥ

वैष्णवी के चक्र से कटे उसके शरीर से बहते रक्त से उसी के बराबर हज़ारों महादैत्य उत्पन्न हुए और सारा जगत भर गया।

8.48

शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना ।
माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम्

śaktyā jaghāna kaumārī vārāhī ca tathāsinā |
māheśvarī triśūlena raktabījaṃ mahāsuram

कौमारी ने शक्ति से, वाराही ने तलवार से और माहेश्वरी ने त्रिशूल से महादैत्य रक्तबीज पर प्रहार किया।

8.49

स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाहनत् पृथक् ।
मातः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः

sa cāpi gadayā daityaḥ sarvā evāhanat pṛthak |
mātaḥ kopasamāviṣṭo raktabījo mahāsuraḥ

क्रोध से भरा महादैत्य रक्तबीज भी अपनी गदा से सब मातृकाओं पर अलग-अलग प्रहार करने लगा।

8.50

तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि ।
पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः

tasyāhatasya bahudhā śaktiśūlādibhirbhuvi |
papāta yo vai raktaughastenāsañchataśo'surāḥ

शक्ति, त्रिशूल आदि से बार-बार घायल होने पर उसका जो रक्त धरती पर गिरा, उससे सैकड़ों असुर उत्पन्न हो गए।

8.51

तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत् ।
व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम्

taiścāsurāsṛksambhūtairasuraiḥ sakalaṃ jagat |
vyāptamāsīttato devā bhayamājagmuruttamam

उस असुर के रक्त से उपजे असुरों से सारा जगत भर गया, और देवता अत्यन्त भयभीत हो गए।

8.52

तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरा ।
उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु

tān viṣaṇṇān surān dṛṣṭvā caṇḍikā prāha satvarā |
uvāca kālīṃ cāmuṇḍe vistīrṇaṃ vadanaṃ kuru

देवताओं को उदास देखकर चण्डिका ने शीघ्रता से काली से कहा: हे चामुण्डे, अपना मुख खूब फैला लो।

8.53

मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून् महासुरान् ।
रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना

macchastrapātasambhūtān raktabindūn mahāsurān |
raktabindoḥ pratīccha tvaṃ vaktreṇānena veginā

मेरे शस्त्रों के प्रहार से गिरने वाली रक्त की बूँदों को और रक्तबीज के रक्त से जन्मे महादैत्यों को तुम अपने इस वेगवान मुख में ले लो।

8.54

भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान् महासुरान् ।
एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ।
भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे

bhakṣayantī cara raṇe tadutpannān mahāsurān |
evameṣa kṣayaṃ daityaḥ kṣīṇarakto gamiṣyati |
bhakṣyamāṇāstvayā cogrā na cotpatsyanti cāpare

उससे उत्पन्न महादैत्यों को खाती हुई रण में विचरो। इस प्रकार रक्त क्षीण होने पर यह दैत्य नष्ट हो जाएगा। जब तुम उन्हें खाती रहोगी, तो नए उग्र असुर उत्पन्न नहीं होंगे।

8.55

इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम् ।
मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्

ityuktvā tāṃ tato devī śūlenābhijaghāna tam |
mukhena kālī jagṛhe raktabījasya śoṇitam

ऋषि बोले: काली से यह कहकर देवी ने रक्तबीज पर त्रिशूल से प्रहार किया, और काली ने उसका रक्त अपने मुख में ले लिया।

8.56

ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ।
न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि

tato'sāvājaghānātha gadayā tatra caṇḍikām |
na cāsyā vedanāṃ cakre gadāpāto'lpikāmapi

तब उसने चण्डिका पर गदा से प्रहार किया, पर उस गदा-प्रहार से उन्हें तनिक भी पीड़ा नहीं हुई।

8.57

तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ।
यतस्ततः स्ववक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति

tasyāhatasya dehāttu bahu susrāva śoṇitam |
yatastataḥ svavaktreṇa cāmuṇḍā sampratīcchati

घायल रक्तबीज के शरीर से बहुत रक्त बहा, और वह जिधर से भी बहा, चामुण्डा ने उसे अपने मुख में ले लिया।

8.58

मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः ।
तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम्

mukhe samudgatā ye'syā raktapātānmahāsurāḥ |
tāṃścakhādātha cāmuṇḍā papau tasya ca śoṇitam

रक्त गिरने से उनके मुख में जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें चामुण्डा खा गईं और उसका रक्त पी गईं।

8.59

देवी शूलेन चक्रेण बाणैरसिभिरृष्टिभिः ।
जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम्

devī śūlena cakreṇa bāṇairasibhirṛṣṭibhiḥ |
jaghāna raktabījaṃ taṃ cāmuṇḍāpītaśoṇitam

जिसका रक्त चामुण्डा पी चुकी थीं, उस रक्तबीज को देवी ने त्रिशूल, चक्र, बाण, तलवार और ऋष्टियों से मार डाला।

8.60

स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसंहतितो हतः ।
नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः

sa papāta mahīpṛṣṭhe śastrasaṃhatito hataḥ |
nīraktaśca mahīpāla raktabījo mahāsuraḥ

हे राजन, शस्त्रों की उस झड़ी से मारा गया और रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज धरती पर गिर पड़ा।

8.61

ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ।
तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः

tataste harṣamatulamavāpustridaśā nṛpa |
teṣāṃ mātṛgaṇo jāto nanartāsṛṅmadoddhataḥ

हे राजन, तब देवताओं को अपार हर्ष हुआ, और उनसे प्रकट हुआ मातृगण रक्त के मद में उन्मत्त होकर नाचने लगा।

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