इस अध्याय में क्या होता है काली ने चण्ड-मुण्ड का वध किया चण्ड और मुण्ड चतुरंगिणी सेना लेकर चलते हैं और देवी को हिमालय के स्वर्ण शिखर पर सिंह पर बैठे मुस्कुराते देखते हैं। अम्बिका का मुख क्रोध से काला पड़ जाता है, और उनके ललाट से काली प्रकट होती हैं: भयंकर, हाथ में खड्ग और पाश, मुण्डमाला पहने, बाघम्बर ओढ़े, मुख फैलाए। वे सेना में घुसकर महावतों समेत हाथियों को मुख में डाल लेती हैं और रथों को दाँतों से चबा डालती हैं। चण्ड बाणों की वर्षा करता है; वे हँसकर उसका सिर काट देती हैं। मुण्ड भी वैसे ही गिरता है। काली दोनों सिर चण्डिका के पास लाकर युद्ध-यज्ञ की भेंट रूप में अर्पित करती हैं। चण्डिका कहती हैं: तुम चण्ड और मुण्ड को लाई हो, इसलिए संसार में चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होगी।
7.1 सप्तशीतितमाध्यायः- ८७ ऋषिरुवाच आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः । चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः
saptaśītitamādhyāyaḥ- 87 ṛṣiruvāca ājñaptāste tato daityāścaṇḍamuṇḍapurogamāḥ | caturaṅgabalopetā yayurabhyudyatāyudhāḥ
ऋषि बोले: आज्ञा पाकर चण्ड और मुण्ड के नेतृत्व में दैत्य हाथी, रथ, घोड़े और पैदल वाली चतुरंगिणी सेना के साथ शस्त्र उठाए चल पड़े।
7.2 ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम् । सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्गे महति काञ्चने
dadṛśuste tato devīmīṣaddhāsāṃ vyavasthitām | siṃhasyopari śailendraśṛṅge mahati kāñcane
उन्होंने देखा कि पर्वतराज के एक विशाल स्वर्णिम शिखर पर सिंह के ऊपर देवी मन्द-मन्द मुस्कराती हुई विराजमान हैं।
7.3 ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः । आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये सत्समीपगाः
te dṛṣṭvā tāṃ samādātumudyamaṃ cakrurudyatāḥ | ākṛṣṭacāpāsidharāstathānye satsamīpagāḥ
उन्हें देखकर वे उन्हें पकड़ने को उद्यत हो गए। कुछ ने धनुष खींच लिए, कुछ ने तलवारें थाम लीं, और कुछ उनके पास तक आ पहुँचे।
7.4 ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति । कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा
tataḥ kopaṃ cakāroccairambikā tānarīn prati | kopena cāsyā vadanaṃ maṣīvarṇamabhūttadā
तब अम्बिका उन शत्रुओं पर अत्यन्त क्रुद्ध हुईं, और क्रोध से उनका मुख स्याही के समान काला पड़ गया।
7.5 भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद् द्रुतम् । काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी
bhrukuṭīkuṭilāttasyā lalāṭaphalakād drutam | kālī karālavadanā viniṣkrāntāsipāśinī
भौंहें चढ़ने से टेढ़े हुए उनके ललाट से तुरंत भयानक मुख वाली काली प्रकट हुईं, जिनके हाथों में खड्ग और पाश था।
7.6 विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा । द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा
vicitrakhaṭvāṅgadharā naramālāvibhūṣaṇā | dvīpicarmaparīdhānā śuṣkamāṃsātibhairavā
वे विचित्र खट्वांग (खोपड़ी लगा दण्ड) धारण किए थीं, नरमुण्डों की माला पहने थीं, बाघम्बर ओढ़े थीं, और सूखे मांस वाले शरीर से अत्यन्त भयंकर लग रही थीं।
7.7 अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा । निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा
ativistāravadanā jihvālalanabhīṣaṇā | nimagnāraktanayanā nādāpūritadiṅmukhā
उनका मुख अत्यन्त फैला हुआ था, लपलपाती जीभ भय उपजाती थी, आँखें भीतर धँसी और लाल थीं, और उनकी गर्जना से सारी दिशाएँ गूँज उठीं।
7.8 सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान् । सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्वलम्
sā vegenābhipatitā ghātayantī mahāsurān | sainye tatra surārīṇāmabhakṣayata tadvalam
वे बड़े वेग से टूट पड़ीं और महादैत्यों का संहार करती हुई देवशत्रुओं की उस सेना को खाने लगीं।
7.9 पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहि योधघण्टासमन्वितान् । समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान्
pārṣṇigrāhāṅkuśagrāhi yodhaghaṇṭāsamanvitān | samādāyaikahastena mukhe cikṣepa vāraṇān
उन्होंने एक ही हाथ से हाथियों को, उनके पृष्ठरक्षकों, अंकुशधारी महावतों, योद्धाओं और घण्टों समेत उठाकर मुँह में डाल लिया।
7.10 तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह । निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्यतिभैरवम्
tathaiva yodhaṃ turagai rathaṃ sārathinā saha | nikṣipya vaktre daśanaiścarvayantyatibhairavam
इसी प्रकार घोड़ों सहित योद्धाओं को और सारथि सहित रथों को मुँह में डालकर वे दाँतों से बड़े भयानक ढंग से चबाने लगीं।
7.11 एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम् । पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत्
ekaṃ jagrāha keśeṣu grīvāyāmatha cāparam | pādenākramya caivānyamurasānyamapothayat
किसी को उन्होंने बालों से पकड़ा, किसी को गले से; किसी को पैर से कुचल डाला और किसी को छाती से टकराकर पीस दिया।
7.12 तैर्मुक्तानि च शस्त्रणि महास्त्राणि तथासुरैः । मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि
tairmuktāni ca śastraṇi mahāstrāṇi tathāsuraiḥ | mukhena jagrāha ruṣā daśanairmathitānyapi
असुरों ने जो शस्त्र और महास्त्र उन पर छोड़े, उन्हें वे क्रोध में मुँह से पकड़ लेतीं और दाँतों से चूर-चूर कर देतीं।
7.13 बलिनां तद्बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम् । ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तथा
balināṃ tadbalaṃ sarvamasurāṇāṃ durātmanām | mamardābhakṣayaccānyānanyāṃścātāḍayattathā
उन्होंने बलवान और दुष्ट असुरों की उस सारी सेना को रौंद डाला; कुछ को खा गईं और कुछ को मार-मारकर गिरा दिया।
7.14 असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः । जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहता रणे
asinā nihatāḥ kecitkecitkhaṭvāṅgatāḍitāḥ | jagmurvināśamasurā dantāgrābhihatā raṇe
कुछ असुर तलवार से मारे गए, कुछ खट्वांग के प्रहार से, और कुछ रणभूमि में उनके दाँतों की नोक से घायल होकर नष्ट हो गए।
7.15 क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां निपातितम् । दृष्ट्वा चण्डोऽभिमैर्भोमाक्षीं तां महासुरः
kṣaṇena tanmahāsainyamasurāṇāṃ nipātitam | dṛṣṭvā caṇḍo'bhimairbhomākṣīṃ tāṃ mahāsuraḥ
क्षण भर में असुरों की उस विशाल सेना को धराशायी देखकर महादैत्य चण्ड अत्यन्त भयंकर काली की ओर दौड़ा।
7.16 शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः । छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः
śaravarṣairmahābhīmairbhīmākṣīṃ tāṃ mahāsuraḥ | chādayāmāsa cakraiśca muṇḍaḥ kṣiptaiḥ sahasraśaḥ
उस महादैत्य ने भयानक नेत्रों वाली देवी को घोर बाणों की वर्षा से ढक दिया, और मुण्ड ने हज़ारों चक्र फेंककर उन्हें ढक दिया।
7.17 तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम् । बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम्
tāni cakrāṇyanekāni viśamānāni tanmukham | babhuryathārkabimbāni subahūni ghanodaram
वे अनेक चक्र उनके मुख में समाते हुए ऐसे चमके, मानो बहुत-से सूर्यबिम्ब काले मेघ के उदर में प्रवेश कर रहे हों।
7.18 ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी । काली करालवक्त्रान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला
tato jahāsātiruṣā bhīmaṃ bhairavanādinī | kālī karālavaktrāntardurdarśadaśanojjvalā
तब भयंकर गर्जना करने वाली काली अत्यन्त क्रोध में भयानक अट्टहास करने लगीं; उनके विकराल मुख में कठिनाई से देखे जा सकने वाले दाँत चमक रहे थे।
7.19 उत्थाय च महासिंहं देवी चण्डमधावत । गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत्
utthāya ca mahāsiṃhaṃ devī caṇḍamadhāvata | gṛhītvā cāsya keśeṣu śirastenāsinācchinat
देवी महासिंह पर चढ़कर चण्ड की ओर दौड़ीं और उसके बाल पकड़कर तलवार से उसका सिर काट दिया।
7.20 छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रश्चक्रे नादं सुभैरवम् । तेन नादेन महता त्रासितं भुवनत्रयम्
chinne śirasi daityendraścakre nādaṃ subhairavam | tena nādena mahatā trāsitaṃ bhuvanatrayam
सिर कटते ही उस दैत्यपति ने अत्यन्त भयानक नाद किया, और उस महानाद से तीनों लोक काँप उठे।
7.21 अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । तमप्यपातयद् भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा
atha muṇḍo'bhyadhāvattāṃ dṛṣṭvā caṇḍaṃ nipātitam | tamapyapātayad bhūmau sā khaḍgābhihataṃ ruṣā
तब चण्ड को गिरा देखकर मुण्ड उनकी ओर दौड़ा। उन्होंने क्रोध में उसे भी तलवार से मारकर धरती पर गिरा दिया।
7.22 हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् । मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम्
hataśeṣaṃ tataḥ sainyaṃ dṛṣṭvā caṇḍaṃ nipātitam | muṇḍaṃ ca sumahāvīryaṃ diśo bheje bhayāturam
चण्ड और महापराक्रमी मुण्ड को गिरा देखकर बची हुई सेना भय से व्याकुल होकर सब दिशाओं में भाग गई।
7.23 शिरञ्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च । प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम्
śirañcaṇḍasya kālī ca gṛhītvā muṇḍameva ca | prāha pracaṇḍāṭṭahāsamiśramabhyetya caṇḍikām
काली चण्ड और मुण्ड के सिर लेकर चण्डिका के पास आईं और प्रचण्ड अट्टहास करते हुए बोलीं।
7.24 मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू । युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि
mayā tavātropahṛtau caṇḍamuṇḍau mahāpaśū | yuddhayajñe svayaṃ śumbhaṃ niśumbhaṃ ca haniṣyasi
मैं तुम्हारे लिए चण्ड और मुण्ड, ये दो महापशु, इस युद्धयज्ञ में भेंट लाई हूँ। शुम्भ और निशुम्भ का वध तुम स्वयं करोगी।
ऋषिरुवाच
7.25 तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ । उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः
tāvānītau tato dṛṣṭvā caṇḍamuṇḍau mahāsurau | uvāca kālīṃ kalyāṇī lalitaṃ caṇḍikā vacaḥ
ऋषि बोले: उन दोनों महादैत्यों चण्ड और मुण्ड को लाया हुआ देखकर कल्याणमयी चण्डिका ने काली से मधुर वचन कहे।
श्रीदेव्युवाच
7.26 यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता । चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि
yasmāccaṇḍaṃ ca muṇḍaṃ ca gṛhītvā tvamupāgatā | cāmuṇḍeti tato loke khyātā devi bhaviṣyasi
देवी बोलीं: हे देवी, क्योंकि तुम चण्ड और मुण्ड दोनों को लेकर आई हो, इसलिए संसार में तुम चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होगी।
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