इस अध्याय में क्या होता है निशुम्भ का वध राजा के पूछने पर मेधा बताते हैं कि रक्तबीज के वध से क्रुद्ध शुम्भ और निशुम्भ युद्ध को आते हैं। निशुम्भ देवी पर झपटता है। निशुम्भ तलवार से सिंह के सिर पर प्रहार करता है; देवी बाणों से उसकी तलवार और ढाल, और चक्र से उसकी शक्ति तोड़ देती हैं। वह जो भी अस्त्र उठाता है, टूट जाता है। घायल होकर वह गिरता है, फिर दस हज़ार भुजाओं के साथ उठकर चक्रों से देवी को ढक देता है। अन्त में देवी शूल से उसका हृदय बेध देती हैं। उसके हृदय से एक और पुरुष ठहर कहता हुआ निकलता है; देवी हँसकर उसका सिर काट देती हैं। काली, शिवदूती और सिंह असुर सेना को खा जाते हैं।
9.1 राजोवाच विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम । देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम्
rājovāca vicitramidamākhyātaṃ bhagavan bhavatā mama | devyāścaritamāhātmyaṃ raktabījavadhāśritam
राजा बोले: भगवन्, आपने मुझे देवी के चरित्र की यह अद्भुत महिमा सुनाई, जो रक्तबीज-वध से जुड़ी है।
9.2 भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते । चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः
bhūyaścecchāmyahaṃ śrotuṃ raktabīje nipātite | cakāra śumbho yatkarma niśumbhaścātikopanaḥ
मैं और सुनना चाहता हूँ। रक्तबीज के गिरने के बाद शुम्भ ने और अत्यन्त क्रोधी निशुम्भ ने क्या किया?
ऋषिरुवाच
9.3 चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते । शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे
cakāra kopamatulaṃ raktabīje nipātite | śumbhāsuro niśumbhaśca hateṣvanyeṣu cāhave
ऋषि बोले: रक्तबीज के मारे जाने और युद्ध में अन्य असुरों के खेत रहने पर शुम्भासुर और निशुम्भ को अपार क्रोध हुआ।
9.4 हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन् । अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया
hanyamānaṃ mahāsainyaṃ vilokyāmarṣamudvahan | abhyadhāvanniśumbho'tha mukhyayāsurasenayā
अपनी विशाल सेना को कटते देख क्रोध से भरा निशुम्भ असुरों की मुख्य सेना लेकर आगे दौड़ा।
9.5 तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः । संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः
tasyāgratastathā pṛṣṭhe pārśvayośca mahāsurāḥ | saṃdaṣṭauṣṭhapuṭāḥ kruddhā hantuṃ devīmupāyayuḥ
उसके आगे, पीछे और दोनों ओर क्रोध से होंठ चबाते महादैत्य देवी को मारने के लिए आ पहुँचे।
9.6 आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः । निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृताव युद्धं तु मातृभिः
ājagāma mahāvīryaḥ śumbho'pi svabalairvṛtaḥ | nihantuṃ caṇḍikāṃ kopātkṛtāva yuddhaṃ tu mātṛbhiḥ
महापराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेना से घिरकर, मातृकाओं से युद्ध करके, क्रोध में चण्डिका को मारने आ पहुँचा।
9.7 ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः । शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः
tato yuddhamatīvāsīddevyā śumbhaniśumbhayoḥ | śaravarṣamatīvograṃ meghayoriva varṣatoḥ
तब देवी और शुम्भ-निशुम्भ के बीच घोर युद्ध छिड़ गया। वे दोनों बरसते हुए दो मेघों की तरह अत्यन्त भयानक बाण-वर्षा करने लगे।
9.8 चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः । ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ
cicchedāstāñcharāṃstābhyāṃ caṇḍikā svaśarotkaraiḥ | tāḍayāmāsa cāṅgeṣu śastraughairasureśvarau
चण्डिका ने अपने बाणों के समूह से उन दोनों के छोड़े बाण काट डाले और शस्त्रों की झड़ी से उन असुरराजों के अंगों पर प्रहार किया।
9.9 निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम् । अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम्
niśumbho niśitaṃ khaḍgaṃ carma cādāya suprabham | atāḍayanmūrdhni siṃhaṃ devyā vāhanamuttamam
निशुम्भ ने तीखी तलवार और चमकती ढाल उठाकर देवी के उत्तम वाहन सिंह के सिर पर प्रहार किया।
9.10 निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम् । अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम्
niśumbho niśitaṃ khaḍgaṃ carma cādāya suprabham | atāḍayanmūrdhni siṃhaṃ devyā vāhanamuttamam
वाहन पर प्रहार होते ही देवी ने क्षुरप्र बाण से निशुम्भ की उत्तम तलवार और आठ चन्द्रचिह्नों वाली ढाल को तुरंत काट डाला।
9.11 छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः । तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम्
chinne carmaṇi khaḍge ca śaktiṃ cikṣepa so'suraḥ | tāmapyasya dvidhā cakre cakreṇābhimukhāgatām
ढाल और तलवार कट जाने पर उस असुर ने शक्ति फेंकी। सामने आती उस शक्ति के भी देवी ने चक्र से दो टुकड़े कर दिए।
9.12 कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः । आयातं मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत्
kopādhmāto niśumbho'tha śūlaṃ jagrāha dānavaḥ | āyātaṃ muṣṭipātena devī taccāpyacūrṇayat
तब क्रोध से फूले दानव निशुम्भ ने त्रिशूल उठाया। आते हुए उस त्रिशूल को भी देवी ने मुक्के के प्रहार से चूर-चूर कर दिया।
9.13 अथादाय गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति । सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता
athādāya gadāṃ so'pi cikṣepa caṇḍikāṃ prati | sāpi devyā triśūlena bhinnā bhasmatvamāgatā
फिर उसने गदा उठाकर चण्डिका पर फेंकी। देवी के त्रिशूल से टूटकर वह भी भस्म हो गई।
9.14 ततः परशुहस्तं तमायान्त दैत्यपुङ्गवम् । आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले
tataḥ paraśuhastaṃ tamāyānta daityapuṅgavam | āhatya devī bāṇaughairapātayata bhūtale
तब हाथ में फरसा लिए आते उस श्रेष्ठ दैत्य को देवी ने बाणों की झड़ी से घायल करके धरती पर गिरा दिया।
9.15 तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे । भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम्
tasminnipatite bhūmau niśumbhe bhīmavikrame | bhrātaryatīva saṃkruddhaḥ prayayau hantumambikām
भयंकर पराक्रमी भाई निशुम्भ के धरती पर गिरते ही शुम्भ अत्यन्त क्रोधित होकर अम्बिका को मारने बढ़ा।
9.16 स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः । भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं बभौ नभः
sa rathasthastathātyuccairgṛhītaparamāyudhaiḥ | bhujairaṣṭābhiratulairvyāpyāśeṣaṃ babhau nabhaḥ
रथ पर ऊँचे खड़े, आठ अनुपम भुजाओं में श्रेष्ठ आयुध थामे वह ऐसा शोभित हुआ मानो सारे आकाश में फैल गया हो।
9.17 तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्घमवादयत् । ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुः सहम्
tamāyāntaṃ samālokya devī śaṅghamavādayat | jyāśabdaṃ cāpi dhanuṣaścakārātīva duḥ saham
उसे आते देख देवी ने शंख बजाया और धनुष की डोरी से ऐसी टंकार की जो सहन करना कठिन था।
9.18 पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च । समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना
pūrayāmāsa kakubho nijaghaṇṭāsvanena ca | samastadaityasainyānāṃ tejovadhavidhāyinā
उन्होंने अपने घण्टे की ध्वनि से दिशाओं को भर दिया, जो सारी दैत्य-सेनाओं का तेज नष्ट करने वाली थी।
9.19 ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः । पूरयामास गगनं गां तथैव दिशो दश
tataḥ siṃho mahānādaistyājitebhamahāmadaiḥ | pūrayāmāsa gaganaṃ gāṃ tathaiva diśo daśa
तब सिंह ने ऐसी भारी गर्जनाओं से आकाश, धरती और दसों दिशाओं को भर दिया, जिनसे बड़े-बड़े हाथियों का मद उतर गया।
9.20 ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत् । कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः
tataḥ kālī samutpatya gaganaṃ kṣmāmatāḍayat | karābhyāṃ tanninādena prāksvanāste tirohitāḥ
तब काली ने आकाश में उछलकर दोनों हाथों से धरती पर प्रहार किया, और उस नाद में पहले की सारी ध्वनियाँ डूब गईं।
9.21 अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह । तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ
aṭṭāṭṭahāsamaśivaṃ śivadūtī cakāra ha | taiḥ śabdairasurāstresuḥ śumbhaḥ kopaṃ paraṃ yayau
शिवदूती ने भयानक, अमंगल अट्टहास किया। उन शब्दों से असुर काँप उठे और शुम्भ अत्यन्त क्रोधित हो गया।
9.22 दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा । तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः
durātmaṃstiṣṭha tiṣṭheti vyājahārāmbikā yadā | tadā jayetyabhihitaṃ devairākāśasaṃsthitaiḥ
जब अम्बिका ने कहा, 'अरे दुष्ट, ठहर, ठहर!', तब आकाश में स्थित देवताओं ने 'जय हो!' का घोष किया।
9.23 शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा । आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया
śumbhenāgatya yā śaktirmuktā jvālātibhīṣaṇā | āyāntī vahnikūṭābhā sā nirastā maholkayā
शुम्भ ने आकर जो अत्यन्त भयानक ज्वालाओं वाली, अग्नि-पर्वत जैसी दमकती शक्ति छोड़ी, उसे देवी ने एक बड़ी उल्का से दूर हटा दिया।
9.24 सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम् । निर्घातनिः स्वनो घोरो जितवानवनीपते
siṃhanādena śumbhasya vyāptaṃ lokatrayāntaram | nirghātaniḥ svano ghoro jitavānavanīpate
हे राजन, शुम्भ के सिंहनाद से तीनों लोकों का अन्तराल भर गया, पर वज्रपात जैसे एक भयानक शब्द ने उसे दबा दिया।
9.25 शुम्भमुक्ताञ्छरान्देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान् । चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः
śumbhamuktāñcharāndevī śumbhastatprahitāñcharān | ciccheda svaśarairugraiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
शुम्भ के छोड़े बाणों को देवी ने और देवी के छोड़े बाणों को शुम्भ ने अपने उग्र बाणों से सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में काट डाला।
9.26 ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम् । स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह
tataḥ sā caṇḍikā kruddhā śūlenābhijaghāna tam | sa tadābhihato bhūmau mūrcchito nipapāta ha
तब क्रुद्ध चण्डिका ने त्रिशूल से उस पर प्रहार किया, और वह आहत होकर मूर्च्छित हो धरती पर गिर पड़ा।
9.27 ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः । आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा
tato niśumbhaḥ samprāpya cetanāmāttakārmukaḥ | ājaghāna śarairdevīṃ kālīṃ kesariṇaṃ tathā
तब निशुम्भ ने होश में आकर धनुष उठाया और देवी, काली तथा सिंह पर बाणों से प्रहार किया।
9.28 पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः । चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम्
punaśca kṛtvā bāhūnāmayutaṃ danujeśvaraḥ | cakrāyudhena ditijaśchādayāmāsa caṇḍikām
फिर उस दैत्यराज ने दस हज़ार भुजाएँ बनाकर चक्रों से चण्डिका को ढक दिया।
9.29 ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी । चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान्
tato bhagavatī kruddhā durgā durgārtināśinī | ciccheda tāni cakrāṇi svaśaraiḥ sāyakāṃśca tān
तब कठिन संकटों का नाश करने वाली भगवती दुर्गा ने क्रोध में अपने बाणों से उन चक्रों और बाणों को काट डाला।
9.30 ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम् । अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः
tato niśumbho vegena gadāmādāya caṇḍikām | abhyadhāvata vai hantuṃ daityasenāsamāvṛtaḥ
तब निशुम्भ दैत्य-सेना से घिरा हुआ गदा उठाकर चण्डिका को मारने के लिए वेग से दौड़ा।
9.31 तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका । खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे
tasyāpatata evāśu gadāṃ ciccheda caṇḍikā | khaḍgena śitadhāreṇa sa ca śūlaṃ samādade
उसके झपटते ही चण्डिका ने तीखी धार वाली तलवार से उसकी गदा काट दी; तब उसने त्रिशूल उठा लिया।
9.32 शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरार्दनम् । हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका
śūlahastaṃ samāyāntaṃ niśumbhamamarārdanam | hṛdi vivyādha śūlena vegāviddhena caṇḍikā
देवताओं को सताने वाले निशुम्भ को त्रिशूल लिए आते देख चण्डिका ने वेग से फेंके त्रिशूल से उसका हृदय बेध दिया।
9.33 भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निः सृतोऽपरः । महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन्
bhinnasya tasya śūlena hṛdayānniḥ sṛto'paraḥ | mahābalo mahāvīryastiṣṭheti puruṣo vadan
त्रिशूल से फटे उसके हृदय से एक और महाबली, महापराक्रमी पुरुष 'ठहर!' कहता हुआ निकला।
9.34 तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः । शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद् भुवि
tasya niṣkrāmato devī prahasya svanavattataḥ | śiraściccheda khaḍgena tato'sāvapatad bhuvi
उसके निकलते ही देवी ने ज़ोर से हँसकर तलवार से उसका सिर काट दिया, और वह धरती पर गिर पड़ा।
9.35 ततः सिंहश्चखादोग्रं दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् । असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान्
tataḥ siṃhaścakhādograṃ daṃṣṭrākṣuṇṇaśirodharān | asurāṃstāṃstathā kālī śivadūtī tathāparān
तब सिंह ने अपनी उग्र दाढ़ों से गर्दनें कुचलकर असुरों को खा डाला, और काली तथा शिवदूती ने दूसरे असुरों को खाया।
9.36 कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः । ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः
kaumārīśaktinirbhinnāḥ kecinneśurmahāsurāḥ | brahmāṇīmantrapūtena toyenānye nirākṛtāḥ
कुछ महादैत्य कौमारी की शक्ति से बिंधकर नष्ट हुए, और दूसरे ब्रह्माणी के मन्त्रपूत जल से भगा दिए गए।
9.37 माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे । वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णोकृता भुवि
māheśvarītriśūlena bhinnāḥ petustathāpare | vārāhītuṇḍaghātena keciccūrṇokṛtā bhuvi
कुछ माहेश्वरी के त्रिशूल से फटकर गिरे, और कुछ वाराही के थूथन के प्रहार से धरती पर चूर-चूर हो गए।
9.38 खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः । वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथापरे
khaṇḍaṃ khaṇḍaṃ ca cakreṇa vaiṣṇavyā dānavāḥ kṛtāḥ | vajreṇa caindrīhastāgravimuktena tathāpare
वैष्णवी के चक्र से दानवों के टुकड़े-टुकड़े हो गए, और दूसरे ऐन्द्री के हाथ से छूटे वज्र से नष्ट हुए।
9.39 केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात् । भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः
kecidvineśurasurāḥ kecinnaṣṭā mahāhavāt | bhakṣitāścāpare kālīśivadūtīmṛgādhipaiḥ
कुछ असुर मारे गए, कुछ महायुद्ध से भाग निकले, और कुछ को काली, शिवदूती और सिंह खा गए।
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← उत्तम चरित्र · अध्याय 8 मातृगण और रक्तबीज का वध उत्तम चरित्र · अध्याय 10 → मैं यहाँ अकेली हूँ: शुम्भ का वध