इस अध्याय में क्या होता है धूम्रलोचन भस्म हुआ दूत क्रोध में लौटकर शुम्भ को देवी की सारी बात सुनाता है। क्रुद्ध असुरराज अपने सेनापति धूम्रलोचन को आज्ञा देता है कि उसे बाल पकड़कर ले आओ। धूम्रलोचन साठ हज़ार असुरों के साथ जाकर देवी को चलने को कहता है। देवी शान्त भाव से उत्तर देती हैं कि यदि तुम बलपूर्वक ले जाओगे, तो मैं क्या कर सकती हूँ? वह उन पर झपटता है, और देवी केवल हुंकार से उसे भस्म कर देती हैं। असुर सेना आक्रमण करती है; देवी का सिंह असुरों को चीरता है और उनका रक्त पीता है, और पूरी सेना नष्ट हो जाती है। यह सुनकर शुम्भ चण्ड और मुण्ड को बड़ी सेना के साथ भेजता है कि देवी को बाँधकर लाएँ, या उन्हें और सिंह को मार डालें।
ऋषिरुवाच
6.1 इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः । समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात्
ityākarṇya vaco devyāḥ sa dūto'marṣapūritaḥ | samācaṣṭa samāgamya daityarājāya vistarāt
ऋषि बोले: देवी के ये वचन सुनकर वह दूत क्रोध से भर गया और लौटकर दैत्यराज को सारी बात विस्तार से कह सुनाई।
6.2 तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्यासुरराट् ततः । सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम्
tasya dūtasya tadvākyamākarṇyāsurarāṭ tataḥ | sakrodhaḥ prāha daityānāmadhipaṃ dhūmralocanam
दूत की वह बात सुनकर असुरराज शुम्भ क्रोधित हो उठा और दैत्यों के सेनापति धूम्रलोचन से बोला।
6.3 हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः । तामानय बलाद् दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम्
he dhūmralocanāśu tvaṃ svasainyaparivāritaḥ | tāmānaya balād duṣṭāṃ keśākarṣaṇavihvalām
हे धूम्रलोचन, तुम अपनी सेना साथ लेकर तुरंत जाओ और उस दुष्टा को बाल पकड़कर घसीटते हुए, विवश करके बलपूर्वक यहाँ ले आओ।
6.4 तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः । स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा
tatparitrāṇadaḥ kaścidyadi vottiṣṭhate'paraḥ | sa hantavyo'maro vāpi yakṣo gandharva eva vā
यदि कोई दूसरा उसकी रक्षा के लिए खड़ा हो, तो उसे भी मार डालना, चाहे वह देवता हो, यक्ष हो या गन्धर्व।
6.5 तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः । वृतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां द्रुतं ययो
tenājñaptastataḥ śīghraṃ sa daityo dhūmralocanaḥ | vṛtaḥ ṣaṣṭyā sahasrāṇāmasurāṇāṃ drutaṃ yayo
ऋषि बोले: इस प्रकार आज्ञा पाकर दैत्य धूम्रलोचन साठ हज़ार असुरों को साथ लेकर शीघ्रता से चल पड़ा।
6.6 स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम् । जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः
sa dṛṣṭvā tāṃ tato devīṃ tuhinācalasaṃsthitām | jagādoccaiḥ prayāhīti mūlaṃ śumbhaniśumbhayoḥ
उसने हिमालय पर विराजमान देवी को देखा और ऊँचे स्वर में कहा: शुम्भ और निशुम्भ के पास चलो।
6.7 न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति । ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम्
na cetprītyādya bhavatī madbhartāramupaiṣyati | tato balānnayāmyeṣa keśākarṣaṇavihvalām
यदि तुम आज प्रसन्नता से मेरे स्वामी के पास नहीं चलोगी, तो मैं तुम्हें बाल पकड़कर घसीटते हुए बलपूर्वक ले जाऊँगा।
श्रीदेव्युवाच
6.8 दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः । बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम्
daityeśvareṇa prahito balavān balasaṃvṛtaḥ | balānnayasi māmevaṃ tataḥ kiṃ te karomyaham
देवी बोलीं: तुम्हें दैत्यराज ने भेजा है, तुम स्वयं बलवान हो और सेना से घिरे हो। ऐसे में यदि तुम मुझे बलपूर्वक ले जाओ, तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ?
ऋषिरुवाच
6.9 इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः । हुङ्कारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः
ityuktaḥ so'bhyadhāvattāmasuro dhūmralocanaḥ | huṅkāreṇaiva taṃ bhasma sā cakārāmbikā tataḥ
ऋषि बोले: यह सुनते ही असुर धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ा, और अम्बिका ने केवल 'हुं' की हुंकार से ही उसे भस्म कर दिया।
6.10 अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका । ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः
atha kruddhaṃ mahāsainyamasurāṇāṃ tathāmbikā | vavarṣa sāyakaistīkṣṇaistathā śaktiparaśvadhaiḥ
तब असुरों की वह विशाल सेना क्रोध से भर उठी, और अम्बिका ने उस पर तीखे बाणों, शक्तियों और फरसों की वर्षा की।
6.11 ततो धुतसटः कोपात् कृत्वा नादं सुभैरवम् । पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः
tato dhutasaṭaḥ kopāt kṛtvā nādaṃ subhairavam | papātāsurasenāyāṃ siṃho devyāḥ svavāhanaḥ
तब देवी का वाहन सिंह क्रोध से अपनी अयाल झटकता हुआ, भयंकर गर्जना करके असुर-सेना पर टूट पड़ा।
6.12 कांश्चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान् । आक्रम्य चाधरेणान्यान् स जघान महासुरान्
kāṃścit karaprahāreṇa daityānāsyena cāparān | ākramya cādhareṇānyān sa jaghāna mahāsurān
कुछ महादैत्यों को उसने पंजों के प्रहार से मारा, कुछ को मुँह से, और कुछ को अपने नीचे दबाकर कुचल डाला।
6.13 केषाञ्चित् पाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी । तथा तलप्रिहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक्
keṣāñcit pāṭayāmāsa nakhaiḥ koṣṭhāni kesarī | tathā talaprihāreṇa śirāṃsi kṛtavān pṛthak
उस सिंह ने अपने नखों से कितनों के पेट फाड़ डाले, और थप्पड़ जैसे पंजे के प्रहार से कितनों के सिर धड़ से अलग कर दिए।
6.14 विच्छिन्नबाहुशिरसः सृतास्तेन तथापरे । पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः
vicchinnabāhuśirasaḥ sṛtāstena tathāpare | papau ca rudhiraṃ koṣṭhādanyeṣāṃ dhutakesaraḥ
कितनों की भुजाएँ और सिर उसने काट गिराए, और अयाल झटकते हुए दूसरों के पेट से रक्त पी लिया।
6.15 क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना । तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना
kṣaṇena tadbalaṃ sarvaṃ kṣayaṃ nītaṃ mahātmanā | tena kesariṇā devyā vāhanenātikopinā
अत्यन्त क्रोध में भरे उस महाबली सिंह ने, जो देवी का वाहन था, क्षण भर में वह सारी सेना नष्ट कर दी।
6.16 श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम् । बलं च क्षयितं कृत्स्त्रं देवीकेसरिणा ततः
śrutvā tamasuraṃ devyā nihataṃ dhūmralocanam | balaṃ ca kṣayitaṃ kṛtstraṃ devīkesariṇā tataḥ
शुम्भ ने सुना कि असुर धूम्रलोचन देवी के हाथों मारा गया और उसकी सारी सेना देवी के सिंह ने नष्ट कर दी।
6.17 चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः । आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ
cukopa daityādhipatiḥ śumbhaḥ prasphuritādharaḥ | ājñāpayāmāsa ca tau caṇḍamuṇḍau mahāsurau
दैत्यराज शुम्भ क्रोध से भर गया, उसके होंठ फड़कने लगे, और उसने चण्ड और मुण्ड नामक दो महादैत्यों को आज्ञा दी।
6.18 हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ । तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु
he caṇḍa he muṇḍa balairbahubhiḥ parivāritau | tatra gacchata gatvā ca sā samānīyatāṃ laghu
हे चण्ड, हे मुण्ड, तुम दोनों बड़ी सेना साथ लेकर वहाँ जाओ और उसे शीघ्र यहाँ ले आओ।
6.19 केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि । तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम्
keśeṣvākṛṣya baddhvā vā yadi vaḥ saṃśayo yudhi | tadāśeṣāyudhaiḥ sarvairasurairvinihanyatām
उसे बाल पकड़कर घसीटो या बाँधकर लाओ। यदि युद्ध में कोई संशय हो, तो सब असुर मिलकर सारे अस्त्र-शस्त्रों से उसे मार डालें।
6.20 तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते । शीघ्रमागम्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्
tasyāṃ hatāyāṃ duṣṭāyāṃ siṃhe ca vinipātite | śīghramāgamyatāṃ baddhvā gṛhītvā tāmathāmbikām
जब वह दुष्टा घायल हो जाए और सिंह मार गिराया जाए, तब उस अम्बिका को पकड़कर, बाँधकर शीघ्र लौट आना।
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