इस अध्याय में क्या होता है नारायणी स्तुति और देवी का वचन महासुर के वध के बाद अग्नि आदि देवता हर्ष से खिले मुखों से कात्यायनी की स्तुति करते हैं। हर श्लोक की टेक है: नारायणि नमोऽस्तु ते। वे विष्णु की शक्ति हैं; ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री और चामुण्डा उन्हीं के रूप हैं। यहीं वह श्लोक है जो घर-घर गाया जाता है: सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके, शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते। देवी वर देती हैं। देवता माँगते हैं कि वे सदा उनके शत्रुओं और जगत् के कष्टों का नाश करें। देवी अपने आगामी रूप बताती हैं: यशोदा के घर जन्मी विन्ध्यवासिनी, रक्तदन्तिका, शताक्षी, शाकम्भरी, दुर्गम असुर को मारने वाली दुर्गा, भीमा और भ्रामरी। जब-जब दानवों से बाधा होगी, तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का नाश करूँगी।
ऋषिरुवाच
11.1 देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् । कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद् विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः
devyā hate tatra mahāsurendre sendrāḥ surā vahnipurogamāstām | kātyāyanīṃ tuṣṭuvuriṣṭalābhād vikāśivaktrābjavikāśitāśāḥ
ऋषि बोले: जब देवी ने वहाँ उस महान असुरराज का वध कर दिया, तब इन्द्र सहित अग्नि आदि देवताओं ने कात्यायनी की स्तुति की। मनोरथ पूरा होने से उनके मुख खिले कमल जैसे दमक रहे थे और उनसे दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं।
देवा ऊचुः
11.2 देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य
devi prapannārtihare prasīda prasīda mātarjagato'khilasya | prasīda viśveśvari pāhi viśvaṃ tvamīśvarī devi carācarasya
देवता बोले: हे शरणागतों की पीड़ा हरने वाली देवी, प्रसन्न होओ। हे सम्पूर्ण जगत की माता, प्रसन्न होओ। हे विश्वेश्वरी, प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा करो। हे देवी, तुम ही चर और अचर सबकी स्वामिनी हो।
11.3 आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैतद् आप्याय्यते कृत्स्त्रमलङ्घ्यवीर्ये
ādhārabhūtā jagatastvamekā mahīsvarūpeṇa yataḥ sthitāsi | apāṃ svarūpasthitayā tvayaitad āpyāyyate kṛtstramalaṅghyavīrye
तुम ही अकेली जगत का आधार हो, क्योंकि तुम पृथ्वी के रूप में स्थित हो। हे अलंघ्य पराक्रम वाली देवी, जल के रूप में स्थित होकर तुम ही इस सम्पूर्ण जगत को तृप्त और पुष्ट करती हो।
11.4 त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया । संमोहितं देवि समस्तमेतत् तेवं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः
tvaṃ vaiṣṇavī śaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā | saṃmohitaṃ devi samastametat tevaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ
तुम अनन्त पराक्रम वाली वैष्णवी शक्ति हो, विश्व का बीज और परम माया हो। हे देवी, तुमने ही यह सारा जगत मोहित कर रखा है, और प्रसन्न होने पर तुम ही इस पृथ्वी पर मुक्ति का कारण बनती हो।
11.5 विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु । त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः
vidyāḥ samastāstava devi bhedāḥ striyaḥ samastāḥ sakalā jagatsu | tvayaikayā pūritamambayaitat kā te stutiḥ stavyaparā paroktiḥ
हे देवी, समस्त विद्याएँ तुम्हारे ही भेद हैं, और जगत की सभी स्त्रियाँ भी तुम्हारे ही रूप हैं। हे माँ, तुम अकेली ने ही इस जगत को व्याप्त कर रखा है। तुम तो स्तुति के योग्य पदार्थों और श्रेष्ठ वाणी से भी परे हो, फिर तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है?
11.6 सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी । त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः
sarvabhūtā yadā devī svargamuktipradāyinī | tvaṃ stutā stutaye kā vā bhavantu paramoktayaḥ
तुम सर्वभूतस्वरूपा देवी हो, स्वर्ग और मोक्ष देने वाली हो। इस रूप में तुम्हारी स्तुति हो चुकी, तो अब तुम्हारी स्तुति के लिए कौन-सी श्रेष्ठ उक्तियाँ पर्याप्त हो सकती हैं?
11.7 सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते । स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते
sarvasya buddhirūpeṇa janasya hṛdi saṃsthite | svargāpavargade devi nārāyaṇi namo'stu te
हे देवी, तुम सब प्राणियों के हृदय में बुद्धि के रूप में स्थित हो और स्वर्ग तथा अपवर्ग (मोक्ष) देने वाली हो। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.8 कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनी । विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते
kalākāṣṭhādirūpeṇa pariṇāmapradāyinī | viśvasyoparatau śakte nārāyaṇi namo'stu te
तुम कला, काष्ठा आदि काल के रूपों में सब वस्तुओं को परिवर्तन की ओर ले जाती हो, और विश्व का उपसंहार करने में समर्थ हो। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.9 सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते
sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike | śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo'stu te
हे सब मंगलों का मंगल करने वाली, कल्याणमयी शिवा, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली गौरी, हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.10 सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि । गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते
sṛṣṭisthitivināśānāṃ śaktibhūte sanātani | guṇāśraye guṇamaye nārāyaṇi namo'stu te
तुम सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति हो, सनातनी हो, गुणों का आश्रय हो और स्वयं गुणमयी हो। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.11 शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते
śaraṇāgatadīnārtaparitrāṇaparāyaṇe | sarvasyārtihare devi nārāyaṇi namo'stu te
तुम शरण में आए दीनों और दुखियों की रक्षा में सदा तत्पर रहती हो। हे सबकी पीड़ा हरने वाली देवी, हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.12 हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि । कौशाम्भः क्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते
haṃsayuktavimānasthe brahmāṇīrūpadhāriṇi | kauśāmbhaḥ kṣarike devi nārāyaṇi namo'stu te
तुम हंसों से जुते विमान पर विराजती हो, ब्रह्माणी का रूप धारण करती हो और कुश से जल छिड़कती हो। हे देवी नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.13 त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि । माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते
triśūlacandrāhidhare mahāvṛṣabhavāhini | māheśvarīsvarūpeṇa nārāyaṇi namo'stu te
तुम त्रिशूल, चन्द्रमा और सर्प धारण करती हो तथा महान वृषभ पर सवार होती हो। माहेश्वरी रूप वाली हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.14 मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽमघे । कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते
mayūrakukkuṭavṛte mahāśaktidhare'maghe | kaumārīrūpasaṃsthāne nārāyaṇi namo'stu te
तुम मोर और मुर्गे से घिरी रहती हो और महाशक्ति नामक भाला धारण करती हो। हे निष्पाप, कौमारी रूप में स्थित हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.15 शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे । प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते
śaṅkhacakragadāśārṅgagṛhītaparamāyudhe | prasīda vaiṣṇavīrūpe nārāyaṇi namo'stu te
तुम शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष जैसे उत्तम आयुध धारण करती हो। वैष्णवी रूप वाली देवी, प्रसन्न होओ। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.16 गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे । वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते
gṛhītogramahācakre daṃṣṭroddhṛtavasundhare | varāharūpiṇi śive nārāyaṇi namo'stu te
तुमने भयंकर महाचक्र धारण किया है और अपनी दाढ़ पर पृथ्वी को उठा लिया था। वाराही रूप वाली कल्याणमयी हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.17 नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे । त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते
nṛsiṃharūpeṇogreṇa hantuṃ daityān kṛtodyame | trailokyatrāṇasahite nārāyaṇi namo'stu te
तुमने उग्र नृसिंह रूप धारण करके दैत्यों के वध का उद्यम किया, और तुम तीनों लोकों की रक्षा करती हो। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.18 किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले । वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते
kirīṭini mahāvajre sahasranayanojjvale | vṛtraprāṇahare caindri nārāyaṇi namo'stu te
तुम मुकुट धारण करती हो, हाथ में महावज्र है, सहस्र नेत्रों से दमकती हो और तुमने वृत्रासुर के प्राण हरे थे। ऐन्द्री रूप वाली हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.19 शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले । घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते
śivadūtīsvarūpeṇa hatadaityamahābale | ghorarūpe mahārāve nārāyaṇi namo'stu te
तुमने शिवदूती रूप में दैत्यों की महान सेना का संहार किया। हे भयंकर रूप वाली, घोर गर्जना करने वाली नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.20 दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे । चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते
daṃṣṭrākarālavadane śiromālāvibhūṣaṇe | cāmuṇḍe muṇḍamathane nārāyaṇi namo'stu te
तुम्हारा मुख दाढ़ों से विकराल है और तुम मुण्डमाला से विभूषित हो। हे मुण्ड का मर्दन करने वाली चामुण्डा, हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.21 लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टे स्वधे ध्रुवे । महारात्रे महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते
lakṣmi lajje mahāvidye śraddhe puṣṭe svadhe dhruve | mahārātre mahāmāye nārāyaṇi namo'stu te
हे लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि और महामाया, हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.22 मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि । नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते
medhe sarasvati vare bhūti bābhravi tāmasi | niyate tvaṃ prasīdeśe nārāyaṇi namo'stu te
हे मेधा, सरस्वती, वरा (श्रेष्ठा), भूति (ऐश्वर्य), बाभ्रवी, तामसी और नियति, हे ईश्वरी, प्रसन्न होओ। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.23 सर्वतः पाणिपादान्ते सर्वतोऽक्षिशिरोमुखे । सर्वतः श्रवणघ्राणे नारायणि नमोऽस्तु ते
sarvataḥ pāṇipādānte sarvato'kṣiśiromukhe | sarvataḥ śravaṇaghrāṇe nārāyaṇi namo'stu te
तुम्हारे हाथ-पैर सब ओर हैं, नेत्र, सिर और मुख सब ओर हैं, और कान तथा नासिका भी सब ओर हैं। हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार है।
11.24 सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते । भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते
sarvasvarūpe sarveśe sarvaśaktisamanvite | bhayebhyastrāhi no devi durge devi namo'stu te
तुम सर्वस्वरूपा हो, सबकी ईश्वरी हो और सब शक्तियों से सम्पन्न हो। हे देवी, भय से हमारी रक्षा करो। हे दुर्गा देवी, तुम्हें नमस्कार है।
11.25 एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम् । पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते
etatte vadanaṃ saumyaṃ locanatrayabhūṣitam | pātu naḥ sarvabhītibhyaḥ kātyāyani namo'stu te
तीन नेत्रों से सुशोभित तुम्हारा यह सौम्य मुख सब प्रकार के भय से हमारी रक्षा करे। हे कात्यायनी, तुम्हें नमस्कार है।
11.26 ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरशूदनम् । त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तुते
jvālākarālamatyugramaśeṣāsuraśūdanam | triśūlaṃ pātu no bhīterbhadrakāli namo'stute
ज्वालाओं से विकराल, अत्यन्त उग्र और सब असुरों का संहार करने वाला तुम्हारा त्रिशूल हमें भय से बचाए। हे भद्रकाली, तुम्हें नमस्कार है।
11.27 हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् । सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव
hinasti daityatejāṃsi svanenāpūrya yā jagat | sā ghaṇṭā pātu no devi pāpebhyo naḥ sutāniva
हे देवी, जो घण्टा अपनी ध्वनि से जगत को भरकर दैत्यों के तेज को नष्ट कर देता है, वह हमें पापों से वैसे ही बचाए जैसे माता पुत्रों की रक्षा करती है।
11.28 असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः । शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम्
asurāsṛgvasāpaṅkacarcitaste karojjvalaḥ | śubhāya khaḍgo bhavatu caṇḍike tvāṃ natā vayam
हे चण्डिका, असुरों के रक्त और चर्बी से लिपटी, तुम्हारे हाथ में चमकती तलवार हमारा मंगल करे। हम तुम्हें प्रणाम करते हैं।
11.29 रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति
rogānaśeṣānapahaṃsi tuṣṭā ruṣṭā tu kāmān sakalānabhīṣṭān | tvāmāśritānāṃ na vipannarāṇāṃ tvāmāśritā hyāśrayatāṃ prayānti
प्रसन्न होने पर तुम सब रोगों को नष्ट कर देती हो, और रुष्ट होने पर सारी मनचाही कामनाओं को छीन लेती हो। तुम्हारी शरण में आए मनुष्यों पर विपत्ति नहीं आती; तुम्हारे आश्रित लोग स्वयं दूसरों को आश्रय देने वाले बन जाते हैं।
11.30 एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य धर्मद्विषां देवि महासुराणाम् । रूपैरनेकैर्बहुधाऽत्ममूर्ति कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या
etatkṛtaṃ yatkadanaṃ tvayādya dharmadviṣāṃ devi mahāsurāṇām | rūpairanekairbahudhā'tmamūrti kṛtvāmbike tatprakaroti kānyā
हे अम्बिके, अपनी मूर्ति को अनेक रूपों में प्रकट करके तुमने आज धर्मद्रोही महादैत्यों का जो संहार किया है, उसे और कौन कर सकता है?
11.31 विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेष्व् आद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या । ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम्
vidyāsu śāstreṣu vivekadīpeṣv ādyeṣu vākyeṣu ca kā tvadanyā | mamatvagarte'timahāndhakāre vibhrāmayatyetadatīva viśvam
विद्याओं में, शास्त्रों में, विवेक के दीपकों में और आदि वाक्यों अर्थात वेदों में तुम्हारे सिवा और कौन है? फिर भी तुम ही इस विश्व को ममता के घोर अन्धकार भरे गड्ढे में बार-बार भटकाती हो।
11.32 रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र । दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्
rakṣāṃsi yatrograviṣāśca nāgā yatrārayo dasyubalāni yatra | dāvānalo yatra tathābdhimadhye tatra sthitā tvaṃ paripāsi viśvam
जहाँ राक्षस हों, भयंकर विष वाले सर्प हों, शत्रु हों, लुटेरों की टोलियाँ हों, जहाँ दावानल हो और समुद्र के बीच में भी, वहाँ तुम उपस्थित रहकर विश्व की रक्षा करती हो।
11.33 विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् । विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः
viśveśvari tvaṃ paripāsi viśvaṃ viśvātmikā dhārayasīti viśvam | viśveśavandyā bhavatī bhavanti viśvāśrayā ye tvayi bhaktinamrāḥ
हे विश्वेश्वरी, तुम विश्व की रक्षा करती हो; विश्वरूपा होकर तुम ही विश्व को धारण करती हो। विश्व के स्वामी भी तुम्हारी वन्दना करते हैं, और जो भक्ति से तुम्हारे आगे झुकते हैं वे विश्व के आश्रय बन जाते हैं।
11.34 देवि प्रसीद परिपालय नोऽपरिभीतेर् नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः । पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्
devi prasīda paripālaya no'paribhīter nityaṃ yathāsuravadhādadhunaiva sadyaḥ | pāpāni sarvajagatāṃ praśamaṃ nayāśu utpātapākajanitāṃśca mahopasargān
हे देवी, प्रसन्न होओ। जैसे अभी असुरों का वध करके तुमने हमारी रक्षा की है, वैसे ही शत्रुओं के भय से सदा हमारी रक्षा करो। सब लोकों के पापों को और उत्पातों के फल से उत्पन्न बड़े-बड़े उपद्रवों को शीघ्र शान्त करो।
11.35 प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणी । त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव
praṇatānāṃ prasīda tvaṃ devi viśvārtihāriṇī | trailokyavāsināmīḍye lokānāṃ varadā bhava
हे विश्व की पीड़ा हरने वाली देवी, हम प्रणाम करने वालों पर प्रसन्न होओ। हे तीनों लोकों के निवासियों द्वारा पूजनीय, सब लोकों को वर देने वाली बनो।
श्रीदेव्युवाच
11.36 वरदाहं सुरगण वरं यन्मनसेच्छथ । तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम्
varadāhaṃ suragaṇa varaṃ yanmanasecchatha | taṃ vṛṇudhvaṃ prayacchāmi jagatāmupakārakam
देवी बोलीं: हे देवगण, मैं वर देने को तत्पर हूँ। तुम मन में जो वर चाहते हो, जो जगत का उपकार करने वाला हो, उसे माँगो; मैं दूँगी।
देवा ऊचुः
11.37 सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि । एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्
sarvabādhāpraśamanaṃ trailokyasyākhileśvari | evameva tvayā kāryamasmadvairivināśanam
देवता बोले: हे सर्वेश्वरी, तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की सब बाधाओं को शान्त करती रहो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।
श्रीदेव्युवाच
11.38 वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे । शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ
vaivasvate'ntare prāpte aṣṭāviṃśatime yuge | śumbho niśumbhaścaivānyāvutpatsyete mahāsurau
देवी बोलीं: वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें युग में शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो अन्य महादैत्य उत्पन्न होंगे।
11.39 नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा । ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी
nandagopagṛhe jātā yaśodāgarbhasambhavā | tatastau nāśayiṣyāmi vindhyācalanivāsinī
तब मैं नन्द गोप के घर यशोदा के गर्भ से जन्म लूँगी और विन्ध्याचल पर निवास करते हुए उन दोनों का नाश करूँगी।
11.40 पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले । अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान्
punarapyatiraudreṇa rūpeṇa pṛthivītale | avatīrya haniṣyāmi vaipracittāṃstu dānavān
फिर मैं अत्यन्त भयानक रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर विप्रचित्ति के वंश वाले दानवों का वध करूँगी।
11.41 भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान् सुदानवान् । रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः
bhakṣayantyāśca tānugrān vaipracittān sudānavān | raktā dantā bhaviṣyanti dāḍimīkusumopamāḥ
उन भयंकर वैप्रचित्त दानवों को खाते समय मेरे दाँत अनार के फूल जैसे लाल हो जाएँगे।
11.42 ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः । स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम्
tato māṃ devatāḥ svarge martyaloke ca mānavāḥ | stuvanto vyāhariṣyanti satataṃ raktadantikām
तब स्वर्ग में देवता और मर्त्यलोक में मनुष्य मेरी स्तुति करते हुए सदा मुझे रक्तदन्तिका कहकर पुकारेंगे।
11.43 भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि । मुनिभिः संस्तुता भूमौ संभविष्याम्ययोनिजा
bhūyaśca śatavārṣikyāmanāvṛṣṭyāmanambhasi | munibhiḥ saṃstutā bhūmau saṃbhaviṣyāmyayonijā
फिर जब सौ वर्षों तक वर्षा न होगी और जल का अभाव होगा, तब मुनियों की स्तुति से मैं बिना गर्भ के, अयोनिजा होकर, पृथ्वी पर प्रकट होऊँगी।
11.44 ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन् । कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः
tataḥ śatena netrāṇāṃ nirīkṣiṣyāmi yanmunīn | kīrtayiṣyanti manujāḥ śatākṣīmiti māṃ tataḥ
तब मैं सौ नेत्रों से मुनियों की ओर देखूँगी, इसलिए मनुष्य मुझे शताक्षी नाम से पुकारेंगे।
11.45 ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः । भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः
tato'hamakhilaṃ lokamātmadehasamudbhavaiḥ | bhariṣyāmi surāḥ śākairāvṛṣṭeḥ prāṇadhārakaiḥ
हे देवताओ, तब जब तक वर्षा न हो, मैं अपने शरीर से उत्पन्न प्राणरक्षक शाकों से सम्पूर्ण जगत का भरण-पोषण करूँगी।
11.46 शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि । तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम् । दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति
śākambharīti vikhyātiṃ tadā yāsyāmyahaṃ bhuvi | tatraiva ca vadhiṣyāmi durgamākhyaṃ mahāsuram | durgā devīti vikhyātaṃ tanme nāma bhaviṣyati
तब मैं पृथ्वी पर शाकम्भरी नाम से विख्यात होऊँगी। वहीं मैं दुर्गम नाम के महादैत्य का वध करूँगी, और इससे मेरा नाम दुर्गा देवी प्रसिद्ध होगा।
11.47 पुनश्चाहं यदा भीमं रूप कृत्वा हिमाचले । रक्षांसि भक्षयिष्यामि पुनीनां त्राणकारणात्
punaścāhaṃ yadā bhīmaṃ rūpa kṛtvā himācale | rakṣāṃsi bhakṣayiṣyāmi punīnāṃ trāṇakāraṇāt
फिर जब मैं हिमालय पर भीषण रूप धारण करके मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों का भक्षण करूँगी,
11.48 तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः । भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति
tadā māṃ munayaḥ sarve stoṣyantyānamramūrtayaḥ | bhīmā devīti vikhyātaṃ tanme nāma bhaviṣyati
तब सब मुनि नतमस्तक होकर मेरी स्तुति करेंगे, और मेरा नाम भीमा देवी प्रसिद्ध होगा।
11.49 यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति । तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वासंख्येयषट्पदम्
yadāruṇākhyastrailokye mahābādhāṃ kariṣyati | tadāhaṃ bhrāmaraṃ rūpaṃ kṛtvāsaṃkhyeyaṣaṭpadam
जब अरुण नाम का दैत्य तीनों लोकों को भारी पीड़ा देगा, तब मैं असंख्य भौंरों से बना भ्रामरी रूप धारण करूँगी
11.50 त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् । भ्रामरीति च मां चोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः
trailokyasya hitārthāya vadhiṣyāmi mahāsuram | bhrāmarīti ca māṃ cokāstadā stoṣyanti sarvataḥ
और तीनों लोकों के हित के लिए उस महादैत्य का वध करूँगी। तब लोग सब ओर मुझे भ्रामरी कहकर मेरी स्तुति करेंगे।
11.51 इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति । तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्
itthaṃ yadā yadā bādhā dānavotthā bhaviṣyati | tadā tadāvatīryāhaṃ kariṣyāmyarisaṃkṣayam
इस प्रकार जब-जब दानवों से बाधा उत्पन्न होगी, तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का संहार करूँगी।
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