इस अध्याय में क्या होता है देवी माहात्म्य के पाठ का फल स्वयं देवी बताती हैं कि इस आख्यान से क्या मिलता है। जो एकाग्र मन से इन स्तुतियों द्वारा नित्य उनकी स्तुति करेगा, उसकी हर बाधा वे दूर करेंगी। जो अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी को भक्ति से मधु-कैटभ, महिषासुर और शुम्भ-निशुम्भ के वध का पाठ करेंगे, उन्हें न विपत्ति होगी, न दरिद्रता, न प्रियजनों का वियोग। शरद की महापूजा में श्रद्धा से इसे सुनने वाला धन, धान्य और सन्तान पाएगा। जो उनके चरित का स्मरण करता है, उस पर अग्नि, शत्रु, वन्य पशु और ग्रहों का बल नहीं चलता। यह कहकर चण्डिका देवताओं के देखते-देखते अन्तर्धान हो जाती हैं, और देवता अपने पद और यज्ञभाग फिर पाते हैं। ऋषि राजा से कहते हैं: वही जगत् को मोहित करती हैं, और प्रसन्न होकर वही ज्ञान और मुक्ति देती हैं।
देव्युवाच
12.1 एभिः स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः । तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्
ebhiḥ stavaiśca māṃ nityaṃ stoṣyate yaḥ samāhitaḥ | tasyāhaṃ sakalāṃ bādhāṃ nāśayiṣyāmyasaṃśayam
देवी बोलीं: जो एकाग्रचित्त होकर इन स्तुतियों से नित्य मेरी स्तुति करेगा, उसकी सारी बाधाएँ मैं निःसन्देह नष्ट कर दूँगी।
12.2 मधुकैटभानाशं च महिषासुरघातनम् । कीर्तयिष्यिन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः
madhukaiṭabhānāśaṃ ca mahiṣāsuraghātanam | kīrtayiṣyinti ye tadvad vadhaṃ śumbhaniśumbhayoḥ
जो लोग मधु-कैटभ के नाश, महिषासुर के वध और उसी प्रकार शुम्भ-निशुम्भ के वध की कथा का कीर्तन करेंगे,
12.3 अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः । स्तोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम्
aṣṭamyāṃ ca caturdaśyāṃ navamyāṃ caikacetasaḥ | stoṣyanti caiva ye bhaktyā mama māhātmyamuttamam
और जो अष्टमी, नवमी तथा चतुर्दशी को एकाग्र मन से भक्तिपूर्वक मेरे इस उत्तम माहात्म्य का पाठ करेंगे,
12.4 न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद् दुष्कृतोत्था न चापदः । भविष्यति न दारिद्रयं न चैवेष्टवियोजनम्
na teṣāṃ duṣkṛtaṃ kiñcid duṣkṛtotthā na cāpadaḥ | bhaviṣyati na dāridrayaṃ na caiveṣṭaviyojanam
उनके लिए न कोई पाप रहेगा, न पाप से उत्पन्न विपत्तियाँ आएँगी। उन्हें न दरिद्रता होगी, न प्रियजनों का वियोग।
12.5 शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः । न शस्त्रानलतोयौघात् कदाचित् सम्भविष्यति
śatruto na bhayaṃ tasya dasyuto vā na rājataḥ | na śastrānalatoyaughāt kadācit sambhaviṣyati
उसे शत्रुओं से, लुटेरों से या राजा से कभी भय नहीं होगा, न शस्त्र, अग्नि और जल की बाढ़ से कोई भय होगा।
12.6 तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं सहाहितैः । श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं महत्
tasmānmamaitanmāhātmyaṃ paṭhitavyaṃ sahāhitaiḥ | śrotavyaṃ ca sadā bhaktyā paraṃ svastyayanaṃ mahat
इसलिए मेरा यह माहात्म्य एकाग्र मन से पढ़ना चाहिए और सदा भक्तिपूर्वक सुनना चाहिए। यह कल्याण का परम और महान साधन है।
12.7 उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान् । तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम
upasargānaśeṣāṃstu mahāmārīsamudbhavān | tathā trividhamutpātaṃ māhātmyaṃ śamayenmama
मेरा माहात्म्य महामारी से उत्पन्न सब उपद्रवों को तथा आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक, तीनों प्रकार के उत्पातों को शान्त कर देता है।
12.8 यत्रैतत् पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम । सदा न तद्विमोक्ष्यामि सांनिध्यं तत्र मे स्थितम्
yatraitat paṭhyate samyaṅnityamāyatane mama | sadā na tadvimokṣyāmi sāṃnidhyaṃ tatra me sthitam
जिस स्थान पर मेरे मन्दिर में इसका नित्य विधिपूर्वक पाठ होता है, उस स्थान को मैं कभी नहीं छोड़ती। वहाँ मेरा सान्निध्य सदा बना रहता है।
12.9 बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे । सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च
balipradāne pūjāyāmagnikārye mahotsave | sarvaṃ mamaitaccaritamuccāryaṃ śrāvyameva ca
बलि अर्पण के समय, पूजा में, अग्निहोत्र में और महोत्सवों में मेरा यह सम्पूर्ण चरित्र पढ़ना और सुनाना चाहिए।
12.10 जानताजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम् । प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथा कृतम्
jānatājānatā vāpi balipūjāṃ tathā kṛtām | pratīcchiṣyāmyahaṃ prītyā vahnihomaṃ tathā kṛtam
विधि जानकर या बिना जाने भी जो बलि-पूजा और अग्निहोम इस प्रकार किया जाए, उसे मैं प्रेम से स्वीकार करूँगी।
12.11 शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी । तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः
śaratkāle mahāpūjā kriyate yā ca vārṣikī | tasyāṃ mamaitanmāhātmyaṃ śrutvā bhaktisamanvitaḥ
शरद ऋतु में जो वार्षिक महापूजा की जाती है, उसमें जो मनुष्य भक्तिपूर्वक मेरा यह माहात्म्य सुनता है,
12.12 सर्वबाधाविनिर्मृक्तो धनधान्यसमन्वितः । मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः
sarvabādhāvinirmṛkto dhanadhānyasamanvitaḥ | manuṣyo matprasādena bhaviṣyati na saṃśayaḥ
वह मेरी कृपा से सब बाधाओं से मुक्त होकर धन और धान्य से सम्पन्न हो जाएगा, इसमें सन्देह नहीं।
12.13 श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथोत्पत्तीः पृथक् शुभाः । पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान्
śrutvā mamaitanmāhātmyaṃ tathotpattīḥ pṛthak śubhāḥ | parākramaṃ ca yuddheṣu jāyate nirbhayaḥ pumān
मेरा यह माहात्म्य, मेरे अलग-अलग शुभ प्राकट्यों की कथाएँ और युद्धों में मेरा पराक्रम सुनकर मनुष्य निर्भय हो जाता है।
12.14 रिपवः संक्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते । नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम्
ripavaḥ saṃkṣayaṃ yānti kalyāṇaṃ copapadyate | nandate ca kulaṃ puṃsāṃ māhātmyaṃ mama śṛṇvatām
मेरा माहात्म्य सुनने वालों के शत्रु नष्ट हो जाते हैं, उनका कल्याण होता है और उनका कुल आनन्दित रहता है।
12.15 शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुः स्वप्नदर्शने । ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम
śāntikarmaṇi sarvatra tathā duḥ svapnadarśane | grahapīḍāsu cogrāsu māhātmyaṃ śṛṇuyānmama
सब शान्तिकर्मों में, बुरा स्वप्न देखने पर और ग्रहों की भयंकर पीड़ा में मेरा माहात्म्य सुनना चाहिए।
12.16 उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः । दुः स्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते
upasargāḥ śamaṃ yānti grahapīḍāśca dāruṇāḥ | duḥ svapnaṃ ca nṛbhirdṛṣṭaṃ susvapnamupajāyate
इससे उपद्रव और ग्रहों की दारुण पीड़ाएँ शान्त हो जाती हैं, और मनुष्यों द्वारा देखा गया बुरा स्वप्न भी शुभ स्वप्न में बदल जाता है।
12.17 बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम् । संघातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम्
bālagrahābhibhūtānāṃ bālānāṃ śāntikārakam | saṃghātabhede ca nṛṇāṃ maitrīkaraṇamuttamam
बालग्रहों से पीड़ित बालकों के लिए यह शान्ति देने वाला है, और मनुष्यों में फूट पड़ने पर मैत्री कराने का उत्तम साधन है।
12.18 दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम् । रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम्
durvṛttānāmaśeṣāṇāṃ balahānikaraṃ param | rakṣobhūtapiśācānāṃ paṭhanādeva nāśanam
यह सब दुराचारियों का बल नष्ट करने वाला है। इसके पाठ मात्र से राक्षस, भूत और पिशाच नष्ट हो जाते हैं।
12.19 सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम्
sarvaṃ mamaitanmāhātmyaṃ mama sannidhikārakam
मेरा यह सम्पूर्ण माहात्म्य मेरी सन्निधि (निकट उपस्थिति) कराने वाला है।
12.20 पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः । विप्राणां भोजनैर्हेमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम्
paśupuṣpārghyadhūpaiśca gandhadīpaistathottamaiḥ | viprāṇāṃ bhojanairhemaiḥ prokṣaṇīyairaharniśam
पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, उत्तम गन्ध और दीप से, ब्राह्मणों को भोजन कराकर, स्वर्ण-दान से और प्रोक्षण के जल से दिन-रात,
12.21 अन्यैश्च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या । प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते
anyaiśca vividhairbhogaiḥ pradānairvatsareṇa yā | prītirme kriyate sāsmin sakṛtsucarite śrute
तथा अन्य अनेक भोगों और दानों से पूरे वर्ष भर जो प्रसन्नता मुझे मिलती है, वही प्रसन्नता इस पावन चरित्र को एक बार सुनने से मिल जाती है।
12.22 श्रुतं हरति पापानि तथाऽरोग्यं प्रयच्छति । रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम
śrutaṃ harati pāpāni tathā'rogyaṃ prayacchati | rakṣāṃ karoti bhūtebhyo janmanāṃ kīrtanaṃ mama
मेरे प्राकट्यों का कीर्तन सुनने से पाप नष्ट होते हैं, आरोग्य मिलता है और भूत-प्रेतों से रक्षा होती है।
12.23 युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम् । तस्मिन् श्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते
yuddheṣu caritaṃ yanme duṣṭadaityanibarhaṇam | tasmin śrute vairikṛtaṃ bhayaṃ puṃsāṃ na jāyate
युद्धों में दुष्ट दैत्यों का संहार करने वाला मेरा चरित्र सुनने पर मनुष्यों को शत्रुओं से भय नहीं होता।
12.24 युष्माभिः स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिः कृताः । ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां गतिम्
yuṣmābhiḥ stutayo yāśca yāśca brahmarṣibhiḥ kṛtāḥ | brahmaṇā ca kṛtāstāstu prayacchanti śubhāṃ gatim
तुमने जो स्तुतियाँ कीं, ब्रह्मर्षियों ने जो कीं और ब्रह्माजी ने जो कीं, वे सब शुभ गति प्रदान करती हैं।
12.25 अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः । दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः
araṇye prāntare vāpi dāvāgniparivāritaḥ | dasyubhirvā vṛtaḥ śūnye gṛhīto vāpi śatrubhiḥ
वन में या निर्जन मार्ग में दावानल से घिर जाने पर, सुनसान स्थान में लुटेरों से घिर जाने पर या शत्रुओं द्वारा पकड़ लिए जाने पर,
12.26 सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः । राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा
siṃhavyāghrānuyāto vā vane vā vanahastibhiḥ | rājñā kruddhena cājñapto vadhyo bandhagato'pi vā
सिंहों या बाघों द्वारा पीछा किए जाने पर, जंगल में जंगली हाथियों से घिरने पर, क्रोधित राजा द्वारा वध की आज्ञा मिलने पर या बन्दी बना लिए जाने पर,
12.27 आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे । पतत्सु चापि शस्त्रेषु संग्रामे भृशदारुणे
āghūrṇito vā vātena sthitaḥ pote mahārṇave | patatsu cāpi śastreṣu saṃgrāme bhṛśadāruṇe
महासागर में नाव पर बैठे हुए आँधी से डगमगाने पर, या अत्यन्त भयंकर युद्ध में शस्त्रों की वर्षा होने पर,
12.28 सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा । स्मरन्ममैतच्छरितं नरो मुच्येत सङ्कटात्
sarvābādhāsu ghorāsu vedanābhyardito'pi vā | smaranmamaitaccharitaṃ naro mucyeta saṅkaṭāt
सब प्रकार की घोर विपत्तियों में या वेदना से पीड़ित होने पर भी जो मनुष्य मेरे इस चरित्र का स्मरण करता है, वह संकट से छूट जाता है।
12.29 मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा । दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम
mama prabhāvātsiṃhādyā dasyavo vairiṇastathā | dūrādeva palāyante smarataścaritaṃ mama
मेरे चरित्र का स्मरण करने वाले से, मेरे प्रभाव से, सिंह आदि हिंसक जीव, लुटेरे और शत्रु दूर से ही भाग जाते हैं।
ऋषिरुवाच
12.30 इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा । पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत
ityuktvā sā bhagavatī caṇḍikā caṇḍavikramā | paśyatāmeva devānāṃ tatraivāntaradhīyata
ऋषि बोले: ऐसा कहकर प्रचण्ड पराक्रम वाली भगवती चण्डिका देवताओं के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गईं।
12.31 तेऽपि देव्या निरातङ्का स्वाधिकारान् यथा पुरा । यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः
te'pi devyā nirātaṅkā svādhikārān yathā purā | yajñabhāgabhujaḥ sarve cakrurvinihatārayaḥ
देवता भी, देवी की कृपा से निर्भय होकर और शत्रुओं के मारे जाने पर, पहले की तरह अपने-अपने अधिकारों का पालन करने लगे और यज्ञभाग ग्रहण करने लगे।
12.32 दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि । जगद्विध्वंसके तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे । निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः
daityāśca devyā nihate śumbhe devaripau yudhi | jagadvidhvaṃsake tasmin mahogre'tulavikrame | niśumbhe ca mahāvīrye śeṣāḥ pātālamāyayuḥ
जब देवी ने युद्ध में देवताओं के शत्रु, जगत का विध्वंस करने वाले, अत्यन्त उग्र और अतुल पराक्रमी शुम्भ को तथा महाबली निशुम्भ को मार डाला, तब बचे हुए दैत्य पाताल चले गए।
12.33 एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः । सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम्
evaṃ bhagavatī devī sā nityāpi punaḥ punaḥ | sambhūya kurute bhūpa jagataḥ paripālanam
हे राजन, इस प्रकार वह भगवती देवी नित्य होते हुए भी बार-बार प्रकट होकर जगत की रक्षा करती हैं।
12.34 तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते । सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति
tayaitanmohyate viśvaṃ saiva viśvaṃ prasūyate | sā yācitā ca vijñānaṃ tuṣṭā ṛddhiṃ prayacchati
उन्हीं के द्वारा यह विश्व मोहित होता है और वही विश्व को जन्म देती हैं। प्रार्थना करने पर वे विज्ञान (आत्मज्ञान) देती हैं और प्रसन्न होने पर समृद्धि प्रदान करती हैं।
12.35 व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर । महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया
vyāptaṃ tayaitatsakalaṃ brahmāṇḍaṃ manujeśvara | mahākālyā mahākāle mahāmārīsvarūpayā
हे नरेश्वर, यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उन्हीं महाकाली से व्याप्त है, जो प्रलय के महाकाल में महामारी का रूप धारण करती हैं।
12.36 सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा । स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी
saiva kāle mahāmārī saiva sṛṣṭirbhavatyajā | sthitiṃ karoti bhūtānāṃ saiva kāle sanātanī
समय आने पर वही महामारी बनती हैं, वही अजन्मा होकर सृष्टि बनती हैं, और वही सनातनी समय पर प्राणियों का पालन करती हैं।
12.37 भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे । सैवाभावे तथालक्ष्मीर्विनाशायोपजायते
bhavakāle nṛṇāṃ saiva lakṣmīrvṛddhipradā gṛhe | saivābhāve tathālakṣmīrvināśāyopajāyate
अभ्युदय के समय वही मनुष्यों के घरों में वृद्धि देने वाली लक्ष्मी होती हैं, और अभाव के समय वही अलक्ष्मी बनकर विनाश का कारण होती हैं।
12.38 स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिबिस्तथा । ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम्
stutā sampūjitā puṣpairdhūpagandhādibistathā | dadāti vittaṃ putrāṃśca matiṃ dharme gatiṃ śubhām
स्तुति करने और पुष्प, धूप, गन्ध आदि से पूजा करने पर वे धन, पुत्र, धर्म में बुद्धि और शुभ गति प्रदान करती हैं।
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← उत्तम चरित्र · अध्याय 11 नारायणी स्तुति और देवी का वचन उत्तम चरित्र · अध्याय 13 → सुरथ और वैश्य को वरदान