उत्तम चरित्र

अध्याय 10: मैं यहाँ अकेली हूँ: शुम्भ का वध

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भवधोनाम नवतितमोऽध्यायः

27 श्लोक · 10 में से 9

इस अध्याय में क्या होता है

मैं यहाँ अकेली हूँ: शुम्भ का वध

भाई को मरा देखकर शुम्भ देवी को ताना देता है: बल के गर्व में तू दूसरों के बल के सहारे लड़ती है। देवी उत्तर देती हैं: इस जगत् में मैं अकेली ही हूँ; मेरे सिवा दूसरी कौन है? दुष्ट, देख, ये मेरी ही विभूतियाँ मुझमें प्रवेश कर रही हैं। ब्रह्माणी आदि सब मातृकाएँ उनके शरीर में लीन हो जाती हैं, और अम्बिका अकेली रह जाती हैं। देवी उसका धनुष तोड़ती हैं, सारथी और घोड़ों को मारती हैं। वह आकाश में उठता है, वहाँ भी युद्ध होता है; देवी उसे धरती पर पटककर शूल से उसकी छाती बेध देती हैं। उसके गिरने से समुद्रों और पर्वतों सहित पृथ्वी काँपती है, फिर शान्त होती है। नदियाँ अपने मार्ग में बहती हैं, मन्द पवन चलता है, गन्धर्व गाते हैं।

ऋषिरुवाच

10.1

निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसंमितम् ।
हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः

niśumbhaṃ nihataṃ dṛṣṭvā bhrātaraṃ prāṇasaṃmitam |
hanyamānaṃ balaṃ caiva śumbhaḥ kruddho'bravīdvacaḥ

ऋषि बोले: प्राणों के समान प्रिय भाई निशुम्भ को मरा हुआ और अपनी सेना को नष्ट होते देखकर शुम्भ ने क्रोध में कहा।

10.2

बलावलेपाद् दुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह ।
अन्यासां बलमाश्रित्य युध्यसे यातिमानिनी

balāvalepād duṣṭe tvaṃ mā durge garvamāvaha |
anyāsāṃ balamāśritya yudhyase yātimāninī

अरी दुष्ट दुर्गे, बल के घमण्ड में गर्व मत कर। तू बड़ी अभिमानिनी बनती है, पर दूसरियों के बल के सहारे लड़ रही है।

श्रीदेव्युवाच

10.3

एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः

ekaivāhaṃ jagatyatra dvitīyā kā mamāparā |
paśyaitā duṣṭa mayyeva viśantyo madvibhūtayaḥ

देवी बोलीं: इस जगत में मैं अकेली ही हूँ; मेरे सिवा दूसरी कौन है? अरे दुष्ट, देख, ये मेरी ही विभूतियाँ मुझमें प्रवेश कर रही हैं।

ऋषिरुवाच

10.4

ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम् ।
तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकावासीत्तदाम्बिका

tataḥ samastāstā devyo brahmāṇīpramukhā layam |
tasyā devyāstanau jagmurekāvāsīttadāmbikā

ऋषि बोले: तब ब्रह्माणी आदि वे सब देवियाँ उस देवी के शरीर में लीन हो गईं, और तब केवल अम्बिका ही रह गईं।

श्रीदेव्युवाच

10.5

अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता ।
सत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव

ahaṃ vibhūtyā bahubhiriha rūpairyadāsthitā |
satsaṃhṛtaṃ mayaikaiva tiṣṭhāmyājau sthiro bhava

देवी बोलीं: अपनी विभूति से जिन अनेक रूपों में मैं यहाँ स्थित थी, उन्हें मैंने समेट लिया है। अब मैं अकेली ही रण में खड़ी हूँ; तू स्थिर हो जा।

ऋषिरुवाच

10.6

ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः ।
पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम्

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ devyāḥ śumbhasya cobhayoḥ |
paśyatāṃ sarvadevānāmasurāṇāṃ ca dāruṇam

ऋषि बोले: तब सब देवताओं और असुरों के देखते-देखते देवी और शुम्भ, दोनों के बीच भयानक युद्ध आरम्भ हुआ।

10.7

शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथा चास्त्रैः सुदारुणैः ।
तयोर्युद्धमभूद् भूयः सर्वलोकभयङ्करम्

śaravarṣaiḥ śitaiḥ śastraistathā cāstraiḥ sudāruṇaiḥ |
tayoryuddhamabhūd bhūyaḥ sarvalokabhayaṅkaram

बाणों की वर्षा, तीखे शस्त्रों और अत्यन्त भयानक अस्त्रों से उनका युद्ध फिर छिड़ गया, जो सब लोकों को भय देने वाला था।

10.8

दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका ।
बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः

divyānyastrāṇi śataśo mumuce yānyathāmbikā |
babhañja tāni daityendrastatpratīghātakartṛbhiḥ

अम्बिका ने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज ने उनको काटने वाले अस्त्रों से नष्ट कर दिया।

10.9

मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी ।
बभञ्ज लीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः

muktāni tena cāstrāṇi divyāni parameśvarī |
babhañja līlayaivograhuṅkāroccāraṇādibhiḥ

और उसके छोड़े दिव्य अस्त्रों को परमेश्वरी ने उग्र हुंकार आदि के उच्चारण से खेल-खेल में ही नष्ट कर दिया।

10.10

ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः ।
सा च तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः

tataḥ śaraśatairdevīmācchādayata so'suraḥ |
sā ca tatkupitā devī dhanuściccheda ceṣubhiḥ

तब उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को ढक दिया, और क्रुद्ध देवी ने अपने बाणों से उसका धनुष काट डाला।

10.11

छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे ।
चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम्

chinne dhanuṣi daityendrastathā śaktimathādade |
ciccheda devī cakreṇa tāmapyasya kare sthitām

धनुष कटने पर दैत्यराज ने शक्ति उठाई; उसके हाथ में रहते ही देवी ने चक्र से उसे भी काट दिया।

10.12

ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् ।
अभ्यधावत्तदा देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः

tataḥ khaḍgamupādāya śatacandraṃ ca bhānumat |
abhyadhāvattadā devīṃ daityānāmadhipeśvaraḥ

तब दैत्यों का अधिपति तलवार और सौ चन्द्रचिह्नों वाली चमकती ढाल लेकर देवी की ओर दौड़ा।

10.13

तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका ।
धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम्

tasyāpatata evāśu khaḍgaṃ ciccheda caṇḍikā |
dhanurmuktaiḥ śitairbāṇaiścarma cārkakarāmalam

उसके झपटते ही चण्डिका ने धनुष से छोड़े तीखे बाणों से उसकी तलवार और सूर्य-किरणों जैसी उज्ज्वल ढाल काट डाली।

10.14

अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह ।
हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधान्वा विसारथिः ।
जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः

aśvāṃśca pātayāmāsa rathaṃ sārathinā saha |
hatāśvaḥ sa tadā daityaśchinnadhānvā visārathiḥ |
jagrāha mudgaraṃ ghoramambikānidhanodyataḥ

उन्होंने उसके घोड़े और सारथि सहित रथ गिरा दिया। घोड़े मारे गए, धनुष कट गया, सारथि न रहा, तब वह दैत्य अम्बिका को मारने के लिए भयानक मुद्गर उठा लाया।

10.15

चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः ।
तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान्

cicchedāpatatastasya mudgaraṃ niśitaiḥ śaraiḥ |
tathāpi so'bhyadhāvattāṃ muṣṭimudyamya vegavān

झपटते हुए उसके मुद्गर को देवी ने तीखे बाणों से काट दिया। फिर भी वह मुक्का तानकर वेग से उनकी ओर दौड़ा।

10.16

स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः ।
देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत्

sa muṣṭiṃ pātayāmāsa hṛdaye daityapuṅgavaḥ |
devyāstaṃ cāpi sā devī talenorasyatāḍayat

उस श्रेष्ठ दैत्य ने देवी के हृदय पर मुक्का मारा, और देवी ने भी हथेली से उसकी छाती पर प्रहार किया।

10.17

तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले ।
स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः

talaprahārābhihato nipapāta mahītale |
sa daityarājaḥ sahasā punareva tathotthitaḥ

हथेली के प्रहार से आहत होकर दैत्यराज धरती पर गिर पड़ा, पर तुरंत फिर उठ खड़ा हुआ।

10.18

उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः ।
तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका

utpatya ca pragṛhyoccairdevīṃ gaganamāsthitaḥ |
tatrāpi sā nirādhārā yuyudhe tena caṇḍikā

उछलकर वह देवी को पकड़े हुए ऊँचे आकाश में जा पहुँचा। वहाँ भी बिना किसी आधार के चण्डिका उससे लड़ती रहीं।

10.19

नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् ।
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम्

niyuddhaṃ khe tadā daityaścaṇḍikā ca parasparam |
cakratuḥ prathamaṃ siddhamunivismayakārakam

तब आकाश में दैत्य और चण्डिका ने आपस में ऐसा मल्लयुद्ध किया जैसा पहले कभी नहीं हुआ था; उसे देखकर सिद्ध और मुनि चकित रह गए।

10.20

ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह ।
उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले

tato niyuddhaṃ suciraṃ kṛtvā tenāmbikā saha |
utpātya bhrāmayāmāsa cikṣepa dharaṇītale

बहुत देर तक उससे मल्लयुद्ध करने के बाद अम्बिका ने उसे ऊपर उठाया, घुमाया और धरती पर पटक दिया।

10.21

स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः ।
अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया

sa kṣipto dharaṇīṃ prāpya muṣṭimudyamya vegitaḥ |
abhyadhāvata duṣṭātmā caṇḍikānidhanecchayā

पटका जाकर धरती पर पहुँचा वह दुष्टात्मा मुक्का तानकर चण्डिका को मारने की इच्छा से वेग से दौड़ा।

10.22

तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् ।
जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि

tamāyāntaṃ tato devī sarvadaityajaneśvaram |
jagatyāṃ pātayāmāsa bhittvā śūlena vakṣasi

सब दैत्यों के उस स्वामी को आते देख देवी ने त्रिशूल से उसकी छाती बेधकर उसे धरती पर गिरा दिया।

10.23

स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः ।
चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम्

sa gatāsuḥ papātorvyāṃ devīśūlāgravikṣataḥ |
cālayan sakalāṃ pṛthvīṃ sābdhidvīpāṃ saparvatām

देवी के त्रिशूल की नोक से घायल होकर वह प्राणहीन होकर धरती पर गिरा, और समुद्रों, द्वीपों और पर्वतों सहित सारी पृथ्वी को हिला गया।

10.24

ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि ।
जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः

tataḥ prasannamakhilaṃ hate tasmin durātmani |
jagatsvāsthyamatīvāpa nirmalaṃ cābhavannabhaḥ

उस दुष्टात्मा के मरते ही सारा जगत प्रसन्न हो गया, संसार को पूर्ण शान्ति मिली और आकाश निर्मल हो गया।

10.25

उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः ।
सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते

utpātameghāḥ solkā ye prāgāsaṃste śamaṃ yayuḥ |
sarito mārgavāhinyastathāsaṃstatra pātite

पहले जो उत्पात के मेघ और उल्काएँ दिख रही थीं, वे शान्त हो गईं, और उसके गिरते ही नदियाँ अपने ठीक मार्ग में बहने लगीं।

10.26

ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भमानसाः ।
बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः

tato devagaṇāḥ sarve harṣanirbhamānasāḥ |
babhūvurnihate tasmin gandharvā lalitaṃ jaguḥ

उसके मारे जाने पर सब देवगणों के मन हर्ष से भर गए, और गन्धर्व मधुर गीत गाने लगे।

10.27

अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः
जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ।

avādayaṃstathaivānye nanṛtuścāpsarogaṇāḥ |
vavuḥ puṇyāstathā vātāḥ suprabho'bhūddivākaraḥ
jajvaluścāgnayaḥ śāntāḥ śāntā digjanitasvanāḥ |

दूसरे वाद्य बजाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। पवित्र वायु बहने लगी, सूर्य की प्रभा उज्ज्वल हो गई, यज्ञ की अग्नियाँ शान्त भाव से प्रज्वलित हुईं और दिशाओं के भयानक शब्द थम गए।

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