01वारंगल के पतन से
प्रोलय वेम रेड्डी उन काकतीय सामन्तों में थे जिन्होंने 1320 और 1330 के दशकों में मुसुनूरि प्रोलय नायक के साथ मिलकर तुग़लक़ सेनाओं को आन्ध्र तट से खदेड़ा। लगभग 1325 में उन्होंने अद्दंकी में दरबार जमाया। उनके दानपत्र ब्राह्मणों के छिने हुए अग्रहार लौटाने और मन्दिरों में पूजा फिर आरम्भ कराने की बात कहते हैं। उनके पुत्र अनवोत ने राजधानी गुण्टूर के पश्चिम में मैदान के ऊपर खड़े कोण्डवीडु के पहाड़ी दुर्ग में ले गए, और राज्य उसी दुर्ग के नाम से जाना गया।
02एर्रन और श्रीनाथ
प्रोलय वेम के दरबारी कवि एर्रन ने नन्नय द्वारा अधूरा छोड़ा गया अरण्य पर्व पूरा करके तेलुगु महाभारत को सम्पूर्ण किया, और नन्नय, तिक्कन और एर्रन का काम एक हुआ। कुमारगिरि रेड्डी नृत्य के प्रेमी थे, और नृत्य पर एक ग्रन्थ, वसन्तराजीयम्, उन्हीं का माना जाता है। पेद कोमटि वेम ने संस्कृत में संगीत पर लिखा और श्रीनाथ को अपना प्रधान दरबारी विद्वान बनाया। श्रीनाथ का शृंगार नैषधम् और काशीखण्डम् आज भी तेलुगु घरों में पढ़े जाते हैं।

03बड़ी शक्तियों के बीच
रेड्डी राजा विजयनगर, बहमनी और ओडिशा के गजपतियों के बीच बसे थे, और अन्त में टिक न सके। 1424 में राच वेम के मारे जाने के बाद कोण्डवीडु विजयनगर के हाथ चला गया। राजमहेन्द्रवरम की शाखा, जिसे योग्य मन्त्री अल्लाड रेड्डी और उनके पुत्रों ने सँभाला, लगभग 1448 तक चली, जब गजपति कपिलेन्द्र देव ने उसे अपने राज्य में मिला लिया। तीन पहाड़ियों पर फैली दीवारों वाला कोण्डवीडु दुर्ग बाद में कई बार हाथ बदलता रहा; 1515 में कृष्णदेवराय ने उसे जीता।
शासक
- 1प्रोलय वेम रेड्डीसंस्थापक; अद्दंकी में दरबारc. 1325–1353
- 2अनवोत रेड्डीराजधानी कोण्डवीडु ले गएc. 1353–1364
- 3अनवेम रेड्डीc. 1364–1386
- 4कुमारगिरि रेड्डीनृत्य और संगीत के आश्रयदाताc. 1386–1402
- 5पेद कोमटि वेमउनके दरबार में श्रीनाथc. 1402–1420
- 6राच वेमकोण्डवीडु के अन्तिम राजाc. 1420–1424
- 7कातय वेम (राजमहेन्द्रवरम)c. 1395–1414
- 8अल्लाड रेड्डी (राजमहेन्द्रवरम)मन्त्री जिन्होंने शाखा को सँभालाc. 1414–1423
- 9वीरभद्र रेड्डी (राजमहेन्द्रवरम)c. 1423–1448
उनकी विरासत
- सम्पूर्ण तेलुगु महाभारत (एर्रन का भाग)
- श्रीनाथ का शृंगार नैषधम् और काशीखण्डम्
- गुण्टूर के पास कोण्डवीडु पहाड़ी दुर्ग
- आन्ध्र तट पर लौटाए गए अग्रहार और मन्दिर-दान





