श्रीकृष्ण

सेस गनेस महेस दिनेस

रसखानलगभग 1548 – लगभग 1628 ई.

सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं।
जाहि अनादि अनंत अखंड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रटैं, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

अर्थ

जिनका गुणगान शेषनाग, गणेश, महेश, सूर्य और इंद्र निरंतर करते हैं; जिन्हें वेद अनादि, अनंत, अखंड, अछेद्य और अभेद्य बताते हैं;

जिन्हें नारद, शुकदेव और व्यास रटते-रटते थक गए फिर भी पार नहीं पा सके: उन्हीं को अहीरों की छोकरियाँ एक दोने भर छाछ के लिए नाच नचाती हैं।

इस भजन के बारे में

तीन पंक्तियाँ प्रभु को वैसे खड़ा करती हैं जैसे वेद और देवता उन्हें जानते हैं, सब वर्णनों से परे, और चौथी पंक्ति सब उलट देती है: अहीर की छोकरियाँ उन्हें थोड़ी-सी छाछ के लिए नचाती हैं। यही एक विरोधाभास पूरी ब्रज-भक्ति है, बिना कुछ माँगे प्रेम द्वारा पकड़ा गया अनंत। सहज प्रवाह और गाँव की ब्रज भाषा वाले रसखान के सवैये कृष्ण-काव्य की सबसे अधिक दोहराई जाने वाली पंक्तियों में हैं, और यह सवैया वृंदावन की होली और रास सभाओं में सुनाई देता है।

Sujan Raskhan, savaiya; text as on Kavita Kosh