श्रीकृष्ण

मानुस हौं तो वही रसखान

रसखानलगभग 1548 – लगभग 1628 ई.

मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदंब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

अर्थ

रसखान कहते हैं: यदि मनुष्य बनूँ तो गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहूँ। यदि पशु बनूँ, जिसमें मेरा कोई वश नहीं, तो रोज़ नंद की गायों के बीच चरूँ। यदि पत्थर बनूँ तो उसी पर्वत का, जिसे प्रभु ने इंद्र की वर्षा से बचाने के लिए छतरी की तरह उठाया था। यदि पक्षी बनूँ तो यमुना के किनारे कदंब की डालों पर बसेरा करूँ।

ग्वाले की इस लाठी और कंबली पर मैं तीनों लोकों का राज्य छोड़ दूँ। नंद की गायें चराते हुए आठ सिद्धियों और नौ निधियों का सुख भी भूल जाऊँ। रसखान कहते हैं, कब इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाब देखूँगा? करोड़ों सोने के महल मैं ब्रज के करील के कुंजों पर न्योछावर कर दूँ।

इस भजन के बारे में

रसखान का जन्म एक पठान परिवार में हुआ, और उन्होंने कृष्ण को अपना हृदय इतना पूरा दे दिया कि “दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता” के अनुसार वे पुष्टिमार्ग में गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य बने और जीवन भर ब्रज में रहे। ये दो सवैये किसी भी रूप में, मनुष्य, गाय, पत्थर या पक्षी, ब्रज का होकर रहने के सिवा कुछ नहीं माँगते। उनकी समाधि गोकुल के पास महावन में है।

Sujan Raskhan, savaiyas; text as on Kavita Kosh