धूरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी॥
वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥
Dhuri bhare ati sohat Syam ju, taisi bani sir sundar choti,
khelat khat phirain angana, pag painjani bajati, piri kachhoti.
Va chhabi ko Raskhan bilokat, varat Kam kala nidhi koti,
kag ke bhag bade sajani, Hari hath son lai gayo makhan roti.
अर्थ
धूल में सने श्याम बहुत सुंदर लग रहे हैं, और सिर पर बनी छोटी चोटी भी वैसी ही सुंदर है। वे आँगन में खेलते-खाते घूम रहे हैं, पैरों में पायल बज रही है, कमर पर पीली कछनी है।
रसखान कहते हैं: उस छवि को देखकर करोड़ों कामदेव और चंद्रमा न्योछावर कर दें। अरी सखी, कौए का भाग्य कितना बड़ा है, वह हरि के हाथ से माखन-रोटी छीन ले गया!
इस भजन के बारे में
एक ही सवैया, और ब्रजभाषा के सबसे प्रिय सवैयों में से: खेल से धूल में सने नन्हे कृष्ण हाथ में माखन-रोटी लिए आँगन में घूम रहे हैं, तभी एक कौआ झपटकर उसे ले जाता है। रसखान बालक पर तरस नहीं खाते; वे कौए से ईर्ष्या करते हैं, जिसे सीधे हरि के हाथ से प्रसाद मिल गया। अंतिम पंक्ति का यही मोड़ इसे याद रखने योग्य बनाता है, और इसी कारण कृष्ण-कीर्तन के गायक इसे अंत के लिए बचाकर रखते हैं।
Sujan Raskhan, savaiya; text as on Kavita Kosh