कोरेगाँव का युद्ध

पक्षपेशवा बाजीराव द्वितीय की सेनाबाजीराव द्वितीय के सरदार, पास ही बापू गोखले की सेना
1818 ई.बनाम
विजेताईस्ट इंडिया कंपनी की टुकड़ीकैप्टन फ़्रांसिस स्टॉन्टन

अंतिम आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान कंपनी की लगभग 800 सैनिकों की एक टुकड़ी, जिनमें अधिकतर दूसरी बटालियन, पहली बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री के थे, कोरेगाँव की गलियों में दिन भर पेशवा की कहीं बड़ी सेना से लड़ी।

तिथि: 1 जनवरी 1818 ई.स्थान: भीमा तट पर कोरेगाँव, पुणे के पासप्रकार: युद्ध
चित्र: Knitin777 · CC BY-SA 3.0
परिणाम

स्टॉन्टन की टुकड़ी दिन भर गाँव में टिकी रही, और जनरल स्मिथ की सेना पास आते देख पेशवा की सेना आगे बढ़ गई।

01गाँव में एक दिन

बाजीराव द्वितीय ने नवंबर 1817 में कंपनी से नाता तोड़ लिया था, और खडकी के बाद वे अपनी सेना के साथ दक्खन में आगे-पीछे हो रहे थे। शिरूर से पुणे की मदद को निकले कैप्टन स्टॉन्टन ने 1 जनवरी 1818 की सुबह भीमा के पार पेशवा की सेना देखी। उसने चारदीवारी वाले कोरेगाँव गाँव पर कब्ज़ा कर लिया। अरब और मराठा पैदल सैनिक बार-बार भीतर घुसे; लड़ाई घर-घर हुई, कंपनी की दो तोपें छिनीं और फिर वापस ली गईं, कई अफ़सर गिरे। दिन भर टुकड़ी के पास पानी नहीं था। रात होते-होते हमले रुक गए, और जनरल स्मिथ की सेना आती देख पेशवा की सेना हट गई।

02स्मारक स्तंभ

कंपनी ने 1822 में कोरेगाँव में एक स्तंभ बनवाया जिस पर उसके मृत सैनिकों के नाम हैं, जिनमें बहुत से बॉम्बे सेना के महार सैनिक थे। युद्ध के छह महीने बाद बाजीराव द्वितीय ने सर जॉन मैल्कम के सामने समर्पण किया और पेंशन पर बिठूर भेज दिए गए; पेशवाई समाप्त हो गई। 1927 में डॉ. भीमराव आंबेडकर महार सैनिकों को श्रद्धांजलि देने स्तंभ पर आए, और तब से हर 1 जनवरी को वहाँ बहुत लोग जुटते हैं। आज यह युद्ध अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग ढंग से याद किया जाता है; यह पृष्ठ लड़ाई के बारे में स्रोतों का कथन दर्ज करता है।

पुणे के पेशवा
राजवंश · 1713–1818 ई.पुणे के पेशवापेशवा छत्रपतियों के वंशानुगत प्रधानमन्त्री थे, और 1713 से 1818 तक पुणे से मराठा राज्य उन्हीं के हाथ में रहा। बाजीराव प्रथम और उनके पुत्र नानासाहेब के समय मराठे भारत की सबसे बड़ी शक्ति बने, फिर 1761 का पानीपत आया और अंग्रेज़ों से युद्ध, जिनमें 1818 में यह वंश समाप्त हुआ।पढ़ें →
महत्त्व

कोरेगाँव जून 1818 में पेशवाई के पतन से पहले पेशवा की सेना की अंतिम लड़ाइयों में था, जिसके बाद पश्चिमी भारत कंपनी के हाथ में आ गया।