01कुलशेखर का दशक
कुलशेखर आळ्वार की पेरुमाळ् तिरुमोऴि का पाँचवाँ दशक वित्तुवक्कोट्टम्मान्, यानी वित्तुवक्कोडु के स्वामी, को गाया गया है, दस पाशुर। उसकी टेक एक शिशु की है: तुम दुःख भी दो, तो भी तुम्हारे सिवा मेरा कोई आश्रय नहीं, जैसे माँ से डाँट खाकर भी बच्चा माँ को ही पुकारता है। इस धाम पर आळ्वारों के यही पद हैं, और पूरे श्रीवैष्णव जगत में गाए जाते हैं। उय्यवन्द, ‘जो उद्धार करने आए’, नाम इन्हीं से आया है।
02पाँच मन्दिर, एक प्राकार
स्थानीय परम्परा कहती है कि वनवास में पाण्डव भारतप्पुऴा पहुँचे और प्रत्येक ने यहाँ विष्णु की स्थापना की, जिनमें अर्जुन की मूर्ति प्रधान है; दूसरी परम्परा शिव-मन्दिर को परशुराम की स्थापना मानकर केरल के 108 शिवालयों में गिनती है। मन्दिर में केरल भूमि से राजेन्द्र प्रथम का एक दुर्लभ चोल अभिलेख है। यहाँ गोपुरम् नहीं, सड़क से बस एक मेहराब, फिर केरल रीति का घिरा परिसर, नमस्कार मण्डप और गोल गर्भगृह। तिरुवोणम् और वैकुण्ठ एकादशी मुख्य उत्सव हैं, और नदी तट पर श्राद्ध होता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- आळ्वार कालकुलशेखर आळ्वार पेरुमाळ् तिरुमोऴि के पाँचवें दशक में वित्तुवक्कोडु को गाते हैं।
- राजेन्द्र चोल प्रथममन्दिर में राजेन्द्र प्रथम का चोल अभिलेख खुदता है।
शोरनूर–कोऴिक्कोड रेल मार्ग पर पट्टाम्बि स्टेशन से लगभग 5 किमी दक्षिण, भारतप्पुऴा पुल के पार।




