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तिरुमेनि अऴगर (सुन्दरेश्वरर) मन्दिर, तिरुवेट्टक्कुडि

किरात रूप में अर्जुन से मिले शिव का समुद्रतटीय धाम, जिसकी उत्सव-मूर्ति मासि मगम पर मछुआरों के साथ समुद्र तक जाती है। सम्बन्दर ने इसे गाया।

निर्माण: चोल कालीन मन्दिर, पाँच तल के राजगोपुरम सहितस्थान: पुदुच्चेरी (कारैक्काल ज़िला)देवता: भगवान शिव तिरुमेनि अऴगर (सुन्दरेश्वरर) रूप में; देवी शान्त नायकी10.98° N, 79.84° E
चित्र: பா.ஜம்புலிங்கம் · CC BY-SA 4.0

01किरात और समुद्र

वेडन शिकारी है। मन्दिर की कथा कहती है कि तीर्थयात्रा में अर्जुन ने यहाँ तप किया और शिव किरात बनकर उनसे मिले और कृपा की; अर्जुन यहाँ त्रिशूल और धनुष लिए उत्सव-मूर्ति के रूप में रखे गए हैं, और स्वामी का किरात रूप और देवी का किराती रूप सबसे सुन्दर उत्सव-मूर्तियों में हैं। यहाँ मुरुगन भी धनुष लिए हैं। देवी इसी तट के मछुआरों के बीच जन्मी मानी जाती हैं, इसलिए मासि मगम पर मछुआरे तिरुमेनि अऴगर को कडल आडु उत्सव के लिए समुद्र तक ले जाते हैं। तट की ओर से आते सम्बन्दर ने वेट्टक्कुडि के स्वामी पर अपना पद गाया।

दर्शन और यात्रा

कारैक्काल से लगभग 6 किमी: पोऱैयार मार्ग पर वरिच्चक्कुडि तक जाकर मेहराब से मुड़ें। मासि मगम (फ़रवरी–मार्च) आने का दिन है।