0124 अक्टूबर 1801
16 जून 1801 को भाइयों ने श्रीरंगम मंदिर और तिरुचिरापल्ली दुर्ग की दीवारों पर अपनी घोषणा चिपकाई थी, जिसमें जम्बूद्वीप के हर जाति और पंथ के लोगों से यूरोपियों को निकालने का आह्वान था। कम्पनी ने उत्तर में बड़ी सेनाएँ शिवगंगा के वनों में भेजीं। 1 अक्टूबर को कालैयार कोविल गिरा। दोनों भाई घायल अवस्था में पकड़े गए और तिरुप्पत्तूर के दुर्ग में लाए गए। 24 अक्टूबर 1801 को यहाँ उन्हें फाँसी दी गई, और साथ में पुत्रों, परिजनों और अनेक साथियों को। परंपरा कहती है कि चिन्न मरुदु ने माँगा था कि उनका शरीर कालैयार कोविल के उस गोपुर की ओर मुख करके दफ़नाया जाए जो उन्होंने बनवाया था; उनकी समाधि वहीं है।
02मंदिर और स्मारक
तिरुप्पत्तूर पाण्ड्य प्रदेश का पुराना देवनगर है। इसका तिरुत्तळिनाथर मंदिर तेवारम में गाए गए देवालयों में है, और ध्यानमुद्रा में बैठे इसके योग भैरव के दर्शन के लिए अष्टमी के दिन दक्षिण भर से भक्त आते हैं। तमिलनाडु सरकार ने फाँसी के स्थान पर मरुदु भाइयों का स्मारक बनवाया है, और हर वर्ष 24 अक्टूबर को शिवगंगा प्रदेश के लोग वहाँ मरुदु पाण्डियर गुरु पूजा के लिए जुटते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1 अक्टूबर 1801कालैयार कोविल कम्पनी के हाथ गिरा; मरुदु भाई जल्द पकड़े गए।
- 24 अक्टूबर 1801मरुदु भाइयों को परिजनों और साथियों सहित तिरुप्पत्तूर दुर्ग में फाँसी दी गई।





