01मोतियों की पालकी
पेरिय पुराणम बताता है कि बालक सम्बन्दर एक धाम से दूसरे धाम पैदल जाते थे, और अरत्तुऱै में स्वामी ने मन्दिर के पुजारियों को स्वप्न देकर उनके लिए मोतियों की पालकी, मोतियों का छत्र और मोतियों की तुरहियाँ तैयार करवाईं; तब से वे पालकी में चलते और आगे तुरहियाँ बजतीं। अप्पर, सम्बन्दर और सुन्दरर तीनों ने यहाँ एक-एक पदिगम गाया। सन्तों के जीवन संकलित करने और कहने वाले नम्बियाण्डार नम्बि और सेक्किऴार भी यहाँ के उपासक माने जाते हैं। महाशिवरात्रि, मार्गऴि तिरुवादिरै और पंगुनि उत्तिरम मनाए जाते हैं।
तोऴुदूर–वृद्धाचलम बस-मार्ग पर तोऴुदूर से लगभग 20 किमी।




