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गोविन्दराज स्वामी मन्दिर, तिरुपति

तिरुपति नगर के हृदय का बड़ा मन्दिर, जिसके चारों ओर स्वयं नगर बसाया गया। श्रीवैष्णव परम्परा के अनुसार 1130 ई. में रामानुजाचार्य ने इसकी प्रतिष्ठा की।

निर्माण: परम्परा के अनुसार 1130 ई. में रामानुजाचार्य द्वारा प्रतिष्ठित; विजयनगर काल के गोपुरमस्थान: आन्ध्र प्रदेश (तिरुपति)देवता: भगवान विष्णु शयन मुद्रा में गोविन्दराज13.64° N, 79.42° E
  1. 1130 ई. (परम्परा)
  2. 15वीं–16वीं शताब्दी
चित्र: Adityamadhav83 · CC BY-SA 3.0

01रामानुज का नगर

परम्परा कहती है कि गोविन्दराज की मूर्ति चिदम्बरम से लाई गई, जहाँ से उसे नटराज मन्दिर से हटाया गया था, और 1130 में रामानुजाचार्य ने उसे तिरुमला पहाड़ियों की तलहटी में स्थापित कर उसके चारों ओर तिरुमला के पुजारियों और सेवकों को बसाया। मन्दिर के चारों ओर गोविन्दराजपट्टनम गाँव बसा और वही तिरुपति नगर बना। गोविन्दराज वेंकटेश्वर के बड़े भाई माने जाते हैं, कुबेर से लिए धन के रखवाले। मन्दिर में पार्थसारथी की भी सन्निधि है, जिसे कुछ वृत्तान्त यहाँ के पुराने भगवान बताते हैं।

02पूर्व का बड़ा गोपुरम

सात तल का पूर्वी गोपुरम विजयनगर काल में बना और नगर की पहचान है। भीतर आण्डाळ, आळ्वारों और रामानुज की सन्निधियाँ हैं, और तिरुमला तिरुपति देवस्थानम का एक संग्रहालय भी। विजयनगर के सालुव और तुलुव राजाओं ने इसे भरपूर दान दिया, और उनके दान देवस्थानम द्वारा प्रकाशित ताम्रपत्र और शिलालेखों में अंकित हैं।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1130 ई. (परम्परा)रामानुजाचार्य पहाड़ियों की तलहटी में गोविन्दराज की प्रतिष्ठा करते हैं।
  2. 15वीं–16वीं शताब्दीविजयनगर राजा मन्दिर को दान देते हैं और गोपुरम बनवाते हैं।
दर्शन और यात्रा

पुराने नगर में तिरुपति रेलवे स्टेशन के पास। अधिकांश तीर्थयात्री तिरुमला जाने से पहले या बाद में दर्शन करते हैं।