01जहाज़ चलाने वाला तमिल
1906 में तूतीकोरिन और कोलम्बो के बीच भाप-जहाज़ों का व्यापार ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन कम्पनी के हाथ में था। नगर के वकील वी. ओ. चिदम्बरम पिल्लै ने तमिल व्यापारियों से धन जुटाया, अक्टूबर 1906 में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कम्पनी पंजीकृत कराई, और दो जहाज़, गैलिया और लावो, ख़रीदे। अंग्रेज़ी कम्पनी ने किराया लगभग शून्य कर दिया और अधिकारियों ने व्यापारियों पर दबाव डाला, फिर भी स्वदेशी जहाज़ भरे चलते रहे। 1908 के आरम्भ में उन्होंने और सुब्रमण्य शिवा ने नगर की कोरल मिल्स में हड़ताल कराई। 12 मार्च 1908 को वे गिरफ़्तार हुए और राजद्रोह के लिए दो आजीवन कालेपानी की सज़ा मिली, जो बाद में घटी। उनके कारावास के बाद कम्पनी नहीं बची। तमिल उन्हें ‘कप्पलोट्टिय तमिऴन्’ कहते हैं।
02मोती, गिरजे और कट्टबोम्मन
इन जलों के मोती पाण्ड्य राजाओं के पास और समुद्र के रास्ते रोम तक जाते थे। तट के परवर मछुआरे परिवार 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों की ओर गए, और ‘अवर लेडी ऑफ़ स्नोज़’ गिरजा उसी समय का है। 1658 में डचों ने बंदरगाह लिया, और 19वीं शताब्दी के आरम्भ से अंग्रेज़ों ने। भीतर ज़िले की काली मिट्टी वाले प्रदेश में वीरपाण्ड्य कट्टबोम्मन का दुर्ग पांचालंकुरिचि था, जिस पर कम्पनी ने सितम्बर 1799 में धावा बोला; 16 अक्टूबर 1799 को उन्हें कयत्तार में फाँसी दी गई। बंदरगाह अब वी. ओ. चिदम्बरनार पोर्ट कहलाता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1658 ई.डचों ने तूतीकोरिन पुर्तगालियों से लिया।
- 16 अक्टूबर 1799पांचालंकुरिचि के कट्टबोम्मन को इसी ज़िले के कयत्तार में फाँसी दी गई।
- अक्टूबर 1906वी. ओ. चिदम्बरम पिल्लै ने स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कम्पनी पंजीकृत कराई।
- 12 मार्च 1908कोरल मिल्स की हड़ताल के बाद वी. ओ. सी. गिरफ़्तार हुए।






