01अप्पूदि अडिगल का गाँव
सेक्किऴार का पेरिय पुराणम् तिंगलूर के अप्पूदि अडिगल की कथा कहता है, जो अप्पर का इतना आदर करते थे कि अपने पुत्रों, कुओं और प्याऊ के नाम भी उन्हीं पर रखे। जब अप्पर अन्ततः गाँव आए, तो अप्पूदि का बड़ा बेटा भोजन के लिए केले का पत्ता काटने गया और उसे साँप ने डस लिया। परिवार ने शव छिपा दिया ताकि अतिथि भूखा न जाए। अप्पर को सच पता चला, वे बालक को मन्दिर ले गए, कैलासनाथर के आगे पदिगम् गाया, और बालक उठ खड़ा हुआ। अप्पूदि अडिगल तिरसठ नायनारों में गिने जाते हैं।
02चन्द्रमा का देवालय
तमिऴ में तिंगळ् चन्द्रमा को कहते हैं, और गाँव उन्हीं का नाम धारण करता है। चन्द्र का अपना देवालय प्रभु के सम्मुख है, और मन्दिर ऐसा बना है कि पंगुनि मास की कुछ रातों में उगते चन्द्रमा की किरणें लिंग पर पड़ती हैं। भक्त सोमवार और पूर्णिमा को आते हैं, और सोम के लिए शास्त्र-विहित श्वेत वस्त्र और कच्चे चावल अर्पित करते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 7वीं शताब्दीपेरिय पुराणम् के अनुसार अप्पर तिंगलूर में गाते हैं और अप्पूदि अडिगल के पुत्र को जीवित करते हैं।
तिरुवैयारु से कुम्भकोणम् की ओर लगभग 3 किलोमीटर। सोमवार की सन्ध्या और पूर्णिमा की रात सबसे अधिक भक्त आते हैं।




