पुनर्निर्मित

खाटू श्याम जी मन्दिर, खाटू

भीम के पौत्र बर्बरीक का धाम, जिनका शीश श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध से पहले माँगा और वरदान दिया कि कलियुग में वे कृष्ण के ही नाम, श्याम, से पूजे जाएँगे। फाल्गुन मेले में लाखों लोग पैदल यहाँ आते हैं।

निर्माण: पहला मन्दिर 1027 ई. में रूप सिंह चौहान ने बनवाया (मन्दिर की परम्परा); आज का सफ़ेद संगमरमर का मन्दिर बाद में फिर बनास्थान: राजस्थान (सीकर ज़िला)देवता: श्री श्याम, बर्बरीक का शीश27.36° N, 75.40° E
  1. 1027 ई. (मन्दिर की परम्परा)
चित्र: Ansh patanker · CC0

01हारे का सहारा

घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक तीन बाण और यह प्रण लेकर कुरुक्षेत्र आए कि जो पक्ष हार रहा होगा, उसी की ओर से लड़ेंगे। श्रीकृष्ण ने देखा कि ऐसा प्रण किसी को भी जीवित न छोड़ेगा। वे ब्राह्मण बनकर आए और दक्षिणा में उनका शीश माँगा। बर्बरीक ने प्रसन्नता से शीश दे दिया, बस युद्ध देखने की इच्छा रखी। कृष्ण ने शीश को पहाड़ी पर रखा और वर दिया: कलियुग में तुम मेरे नाम से पूजे जाओगे। इसीलिए भक्त उन्हें श्याम बाबा और हारे का सहारा कहते हैं, और जब हर द्वार बन्द हो जाए, तब उनके पास आते हैं।

02श्याम कुण्ड और फाल्गुन मेला

मन्दिर की परम्परा कहती है कि शीश खाटू में भूमि में दबा रहा, जब तक एक गाय एक ही स्थान पर अपना दूध न बहाने लगी। वहाँ खुदाई हुई, शीश मिला, और स्वप्न के बाद स्थानीय शासक रूप सिंह चौहान ने 1027 ई. में उसके लिए मन्दिर बनवाया। वह गड्ढा ही श्याम कुण्ड है, जहाँ यात्री दर्शन से पहले स्नान करते हैं। बड़ा मेला फाल्गुन शुक्ल पक्ष में लगता है और एकादशी को चरम पर होता है; कई दिनों तक रींगस से आने वाली सड़कें केसरिया निशान उठाए लोगों की नदी बन जाती हैं, और बहुत से लोग अन्तिम अठारह किलोमीटर नंगे पाँव चलते हैं।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1027 ई. (मन्दिर की परम्परा)श्याम कुण्ड में मिले शीश पर रूप सिंह चौहान पहला मन्दिर बनवाते हैं।
दर्शन और यात्रा

जयपुर–सीकर रेल मार्ग पर रींगस निकटतम स्टेशन है, लगभग 17 किमी। भीड़ के साथ चलने का मन न हो तो फाल्गुन मेले के दिन टालें।