01हारे का सहारा
घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक तीन बाण और यह प्रण लेकर कुरुक्षेत्र आए कि जो पक्ष हार रहा होगा, उसी की ओर से लड़ेंगे। श्रीकृष्ण ने देखा कि ऐसा प्रण किसी को भी जीवित न छोड़ेगा। वे ब्राह्मण बनकर आए और दक्षिणा में उनका शीश माँगा। बर्बरीक ने प्रसन्नता से शीश दे दिया, बस युद्ध देखने की इच्छा रखी। कृष्ण ने शीश को पहाड़ी पर रखा और वर दिया: कलियुग में तुम मेरे नाम से पूजे जाओगे। इसीलिए भक्त उन्हें श्याम बाबा और हारे का सहारा कहते हैं, और जब हर द्वार बन्द हो जाए, तब उनके पास आते हैं।
02श्याम कुण्ड और फाल्गुन मेला
मन्दिर की परम्परा कहती है कि शीश खाटू में भूमि में दबा रहा, जब तक एक गाय एक ही स्थान पर अपना दूध न बहाने लगी। वहाँ खुदाई हुई, शीश मिला, और स्वप्न के बाद स्थानीय शासक रूप सिंह चौहान ने 1027 ई. में उसके लिए मन्दिर बनवाया। वह गड्ढा ही श्याम कुण्ड है, जहाँ यात्री दर्शन से पहले स्नान करते हैं। बड़ा मेला फाल्गुन शुक्ल पक्ष में लगता है और एकादशी को चरम पर होता है; कई दिनों तक रींगस से आने वाली सड़कें केसरिया निशान उठाए लोगों की नदी बन जाती हैं, और बहुत से लोग अन्तिम अठारह किलोमीटर नंगे पाँव चलते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1027 ई. (मन्दिर की परम्परा)श्याम कुण्ड में मिले शीश पर रूप सिंह चौहान पहला मन्दिर बनवाते हैं।
जयपुर–सीकर रेल मार्ग पर रींगस निकटतम स्टेशन है, लगभग 17 किमी। भीड़ के साथ चलने का मन न हो तो फाल्गुन मेले के दिन टालें।




