पुनर्निर्मित

कपालीश्वर मन्दिर, मयिलापुर

पुराने मद्रास का बड़ा शिव मन्दिर, जहाँ माता पार्वती ने मोरनी के रूप में शिव की आराधना की और जहाँ तिरुज्ञानसम्बन्दर ने एक मृत कन्या को फिर जीवित किया। समुद्र-तट का मन्दिर पुर्तगाली काल में नष्ट हुआ और मन्दिर भीतर की ओर फिर बना।

निर्माण: 7वीं शताब्दी में नायनमारों ने गाया; समुद्र-तट का पुराना मन्दिर खोने के बाद वर्तमान मन्दिर 16वीं शताब्दी में बना; पूर्वी गोपुरम 1906स्थान: तमिलनाडु (चेन्नई)देवता: भगवान शिव कपालीश्वर रूप में, देवी कर्पगाम्बाल के साथ13.03° N, 80.27° E
  1. 7वीं शताब्दी
  2. 16वीं शताब्दी
  3. 1906
चित्र: Dassap · CC BY-SA 4.0

01मोरनी और पूम्पावै

मयिलापुर का नाम मयिल, यानी मोर, से है। मन्दिर का स्थल पुराण कहता है कि शापवश मोरनी बनीं माता पार्वती ने यहाँ पुन्नै वृक्ष के नीचे लिंग की पूजा की, तब शिव ने उन्हें फिर स्वरूप दिया। प्रांगण में उसी वृक्ष के नीचे छोटा मन्दिर यह दृश्य दिखाता है। दूसरी कथा तेवारम में है। सिवनेसर नाम के व्यापारी ने साँप के डसने से मरी बेटी पूम्पावै की अस्थियाँ और भस्म एक घड़े में रखी थीं। 7वीं शताब्दी में तिरुज्ञानसम्बन्दर आए, उन्होंने कपालीश्वर के आगे एक-एक पद गाया, और कन्या घड़े से जीवित उठ खड़ी हुई।

02तट से सरोवर तक

तेवारम के पद मन्दिर को समुद्र के किनारे बताते हैं। 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों ने मयिलापुर तट पर सान थोमे का गिरजाघर बनाया, और मन्दिर की परम्परा, जिसे अनेक इतिहासकार मानते हैं, कहती है कि पुराना मन्दिर वहीं था। विजयनगर काल का वर्तमान मन्दिर भीतर की ओर एक बड़े सरोवर के पास है। इसका लगभग 37 मीटर ऊँचा पूर्वी गोपुरम 1906 में पूरा हुआ। पंगुनी उत्सव में तिरसठ नायनमारों की शोभायात्रा, अरुपत्तिमूवर, गलियों में निकलती है और पूरा मयिलापुर देखने उमड़ता है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 7वीं शताब्दीतिरुज्ञानसम्बन्दर यहाँ पूम्पावै पदिगम गाते हैं।
  2. 16वीं शताब्दीपुर्तगाली मयिलापुर तट पर सान थोमे गिरजाघर बनाते हैं; मन्दिर भीतर की ओर फिर बनता है।
  3. 1906पूर्वी गोपुरम पूरा होता है।
दर्शन और यात्रा

मध्य चेन्नई के मयिलापुर में; एमआरटीएस का तिरुमयिलै स्टेशन पास है। पंगुनी ब्रह्मोत्सव (मार्च–अप्रैल) सबसे बड़ा उत्सव है।