01लाचित ने इटाखुली लिया, 1667
1663 की मीर जुमला की सन्धि के बाद गुवाहाटी का मुग़ल फ़ौजदार इटाखुली पहाड़ी के दुर्ग से नदी-तट को नियन्त्रण में रखता था, जो ब्रह्मपुत्र के सँकरे भाग पर पहरा देता था। अगस्त 1667 में अहोम राजा चक्रध्वज सिंह ने लाचित बड़फुकन को सेना और नौकाओं के बेड़े के साथ नदी के रास्ते भेजा। दोनों तटों पर कई लड़ाइयों के बाद नवम्बर 1667 में लाचित ने इटाखुली ले लिया, और मुग़लों को गुवाहाटी से मानस तक खदेड़ दिया गया। जब आमेर के राजा रामसिंह उसे वापस जीतने आए, तो अहोम रक्षा एक तट पर कामाख्या और इटाखुली की पहाड़ियों और दूसरे पर अश्वक्रान्ता पर टिकी थी, और मार्च 1671 में उनके बीच के जल में सराईघाट का युद्ध लड़ा गया।
02मुग़लों का अन्तिम मोर्चा, 1682
1679 में गुवाहाटी के अहोम सूबेदार ने नगर मुग़लों को लौटा दिया, और इटाखुली फिर उनका दुर्ग बन गया। 1681 में गदाधर सिंह गद्दी पर बैठे तो उन्होंने उसे वापस लेने के युद्ध की तैयारी की। 1682 की गर्मियों में उनकी सेनाएँ दोनों तटों से नीचे आईं। मुग़ल सेनापति अली अकबर ने सरानिया की अहोम चौकी पर हमला किया और पीछे धकेल दिया गया; अगस्त 1682 में पानीदुआर पर नौसैनिक हार के बाद उसने भोर में इटाखुली छोड़ दिया और नाव से चुपचाप नीचे की ओर निकल गया। अहोमों ने लौटती सेना का मानस तक पीछा किया और फिर कभी गुवाहाटी नहीं खोया। उस दिन छीनी गई तोपें आज भी असम में दिखाई जाती हैं। बाद में अहोम राजाओं ने इस पहाड़ी पर नदी तक उतरते घाटों के साथ शुक्रेश्वर शिव मन्दिर बनवाया।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- नवम्बर 1667लाचित बड़फुकन इटाखुली लेकर गुवाहाटी को मुग़लों से मुक्त करते हैं।
- मार्च 1671पहाड़ी के नीचे सराईघाट का युद्ध होता है।
- 1679गुवाहाटी और इटाखुली फिर मुग़लों के हाथ जाते हैं।
- अगस्त 1682मुग़ल सेना गदाधर सिंह की सेना के आगे इटाखुली छोड़ देती है।





